राजन पारकर
देश में आज तीन तस्वीरें एक साथ दिखाई दे रही हैं। एक तरफ टाटा समूह की जगुआर लैंड रोवर में हजारों नौकरियों पर संकट की खबर है, दूसरी तरफ मुंबई की सड़क पर मिले तीन लाख रुपये ईमानदारी से पुलिस को सौंपने वाला एक पुलिसकर्मी व्यवस्था के बीच इंसानियत का चेहरा दिखाता है और तीसरी तरफ मराठा आरक्षण के सवाल पर अंतरवाली सराटी में आंदोलन की आग के सामने ओबीसी नेतृत्व भी मैदान में उतरता दिखाई दे रहा है।
जगुआर लैंड रोवर में अगले दो वर्षों में लगभग चार हजार कर्मचारियों की छंटनी की खबर सामने आई है। बताया जा रहा है कि इसका असर मुख्यतः प्रबंधन और वेतनभोगी कर्मचारियों पर पड़ेगा तथा खर्च कम करने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना का सहारा लिया जाएगा। अब जरा इस खबर को राजनीति की खिड़की से देखिए। जब कोई कंपनी खर्च कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाती है तो उसे ‘कॉस्ट ऑप्टिमाइजेशन’ कहा जाता है। लेकिन जब आम आदमी अपने घर का खर्च कम करने के लिए एक नौकरी छोड़कर दूसरी तलाश करता है, तब उसे बेरोजगार कहा जाता है! वाह रे अर्थशास्त्र! कंपनी के लिए कर्मचारी ‘कॉस्ट’ है और कर्मचारी के लिए वही नौकरी परिवार की रोटी, बच्चों की पढ़ाई और घर का भविष्य है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि चुनावी भाषणों में ‘नौकरी’ सबसे लोकप्रिय शब्द है, लेकिन सत्ता के गलियारों में नौकरी पैदा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी आंकड़ों को सुंदर बनाना हो जाता है। आखिर सवाल यह है कि गाड़ी किस दिशा में दौड़ रही है और रोजगार किस दिशा में जा रहा है?
तीन लाख सड़क पर पड़े थे, लेकिन ईमानदारी उठाकर ले गई!
मुंबई में पुलिस कर्मचारी महेश गावडे को सड़क पर मिले लगभग तीन लाख रुपये मिले। बताया जाता है कि उन्होंने उस रकम को अपने पास रखने के बजाय पुलिस के हवाले कर दिया।
यह खबर सिर्फ तीन लाख रुपये मिलने की खबर नहीं है। यह उस मुंबई की खबर है जिसके बारे में हम अक्सर कहते हैं कि यहां किसी के गिरने से पहले लोग मोबाइल निकालते हैं और मदद करने से पहले वीडियो बनाते हैं! लेकिन महेश गावडे ने साबित कर दिया कि व्यवस्था में अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए ईमानदारी कोई भाषण नहीं, बल्कि ड्यूटी है। बताया जाता है कि एक तेज रफ्तार कार से पैसों की बैग सड़क पर गिर गई थी। एक व्यक्ति उसे उठाने लगा तो गावडे ने उसे रोका और रकम पुलिस के हवाले कर दी।अब जरा कल्पना कीजिए। तीन लाख रुपये सड़क पर पड़े हों, आसपास भीड़ हो, और सामने कोई पूछने वाला न हो…ऐसे समय में ईमानदारी का असली इम्तिहान होता है।
आजकल राजनीति में करोड़ों रुपये का हिसाब पूछिए तो समितियां बनती हैं, जांच बैठती है, बयान आते हैं और कभी-कभी मामला फाइलों में इतना लंबा सफर करता है कि फाइल खुद बूढ़ी हो जाती है! लेकिन सड़क पर मिले तीन लाख रुपये एक पुलिसकर्मी ने बिना किसी भाषण के लौटा दिए। यही फर्क है ईमानदारी और ईमानदारी के विज्ञापन में!
आरक्षण की राजनीति का तापमान बढ़ा!
मराठा आरक्षण के सवाल पर मनोज जरांगे पाटील का आंदोलन और उपवास जारी है। खबरों के अनुसार उनके आंदोलन के बीच अब ओबीसी पक्ष से भी अंतरवाली सराटी में उपोषण शुरू किया गया है। यानी एक ही मैदान में दो समाजों की भावनाएं आमने-सामने खड़ी हैं और बीच में सरकार है। सरकार के लिए इससे मुश्किल स्थिति और क्या होगी? एक तरफ मराठा समाज की आरक्षण संबंधी मांगें हैं, दूसरी तरफ ओबीसी समाज अपने अधिकारों और आरक्षण की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। दोनों तरफ भावनाएं प्रबल हैं और दोनों तरफ नेतृत्व अपने-अपने समाज के सामने जवाबदेह है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है।
न्याय कैसे होगा और ऐसा न्याय कैसे होगा जिसे दोनों पक्ष न्याय मानें? बताया जा रहा है कि सरकार की ओर से बातचीत और समझौते के प्रयास किए जा रहे हैं। राजनीतिक नेताओं की मुलाकातें हो रही हैं। आश्वासन दिए जा रहे हैं। मगर आंदोलनकारी नेतृत्व का कहना है कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहिए।
