मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : छबीली

अवधी व्यंग्य : छबीली

एड. राजीव मिश्र, मुंबई

जब से सावन चढ़ा है, खेत-सिवान, बाग-बगइचा सब पर एक अलगइ नशा चढ़ि गवा है। बॉलीवुड फिल्मन मा अवधी से लइके हिंदी गानन के मानो भाग जागि गय होय। अब कुछ यही नशा में भगेलू भकभकाइ गएं हैं। सुबह से मुबाइल में सावन के गाना बजावै शुरू करत हैं अउर रात तक बस सावनय सावन चलि रहा है। अब इही सावन में भगेलू के पड़ोसी जोखन पहलवान के सढुआइन छबीली जब से आई है पूरे गांव के लड़िकन के ऊपर सावन के नशा चार गुना बढ़ि गवा है। अब भगेलू पहिलय से फिलिम अउर भोजपुरी गानन के शौकीन ओहिपे पड़ोस में छबीली जइसन सुंदरी होय तो भगेलू का केहू के नींद हराम होइ जाई। छबीली जेहिकर चार-चार चइलाठा जइसन जीजा होयं ओहिके पांव जमीन पर तो पड़ी न अउर इधर भगेलू है जे मनय-मन छबीली के आपन मानि चुके हैं। जोखन के सामने दुवारे जोखन अउर उनकर तीन पहलवान भाई हमेशा दंड लगावत रहत हैं। भगेलू आज तक छबीली से बात तो छोड़व छबीली के सूरत तक नहीं देख पाए। जब सामने से छबीली के देखय के कउनउ जतन नहीं देखाइ नहीं पड़ा तो भगेलू छत के सहारा लिए अउर होत सबेरे छत पे खटिया डारि के बइठि गएं। सुबह से दुपहर होइ गवा पर छबीली छत पर देखाइ नहीं परी। भगेलू छत से नीचे जहइ वाला रहे कि तब तक छबीली चटकोरय लिपिस्टिक लगाए भगेलू के कान में शहद घोरत छत पे कजरी गावत ‘कइसे खेलन जइबै सावन में कजरिया, बदरिया घिरि आई ननदी’। इतना सुनतय भगेलू के मानो भाग जगि गवा होय अउर बिना सोचे-बिचारे एक गाना अपने छत से छबीली के छत पर देइ मारे, तू लगावेलू जब लिपिस्टिक, झूमे ला सारा डिस्टिक। छबीली मुस्कियाय के दूसर कजरी भगेलू की ओर लोकाइ दिहिस…. बुलेट पे जीजा… बुलेट पे जीजा.. लेइ चला घुमावै बुलेट पे जीजा। इतना सुनतै, भगेलू खुला नेवता समझि के अपने छत से छबीली के छत पे कूदि परे। भगेलू के ई मनबढ़ई देखतै छबीली जोर से चिल्लाय परी। बस का रहा नीचे से छबीली के चारिउ पहलवान जीजा, भगेलू के भगाय-भगाय जवन मार मारेन कि भगेलू आज तक सावन में घर से बाहर नहीं निकरे।

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