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गाली के हेल्थ संबंधी फायदे

कांव-कांव : हरिगोविंद विश्वकम

गाली भारत में हमेशा से प्रासंगिक रही है। इसके बावजूद लोगों ने गाली को बदनाम करके रखा है। पता नहीं किसने कह दिया था कि गाली देना बुरी बात है। ऐसे लोगों को गाली के बारे में कुछ भी नहीं पता। अरे भाई, गाली बुरी वैâसे है? गाली के अनगिनत फायदे हैं। गाली का सबसे बड़ा फायदा मन को होता है। गाली देने के बाद मन हल्का हो जाता है। जब आदमी के भीतर गुस्सा उबलता है। सामने वाला अपनी हरकतों से उस गुस्से को और उबालता हो, तब गाली दवा का काम करती है। गाली देने के बाद गुस्सा शांत हो जाता है। जैसे प्रेशर कुकर की सीटी। सीटी न बजे तो कुकर फट सकता है। इसी तरह गाली न निकले तो आदमी गुस्से से फट सकता है। इसलिए गाली को भावनात्मक प्रेशर रिलीज सिस्टम कहना गलत नहीं होगा।
हमेशा उपलब्ध
आजकल हर आदमी भयंकर तनाव में रहता है। नौकरी का तनाव। महंगाई का तनाव। ट्रैफिक का तनाव। बिजली का बिल ज्यादा आने का तनाव। बैंक का मैसेज और मोबाइल पर हर पांच मिनट में आनेवाले किसी नए ऑफर का तनाव। तनाव इतने हैं और उनसे दूर होने के विकल्प कुछ नहीं। योग करने के लिए आदमी के पास समय नहीं है। जिम जाने के लिए पैसा नहीं है। पहाड़ पर जाकर ध्यान लगाने के लिए छुट्टी नहीं मिलती है। अब ले-देकर बची गाली। वह मुफ्त है। हमेशा उपलब्ध है। उसके लिए किसी ऐप पर रजिस्ट्रेशन भी नहीं करना पड़ता। आदमी गाली देकर तनाव दूर कर लेता है। आप अपने आस-पास देख लीजिए। जो आदमी गाली देता है, वह ज्यादा खुश रहता है। टेंशन-प्रâी रहता है। नियमित गाली देनेवाले को कोई बीमारी भी नहीं होती।
गाली का एक और बहुत बड़ा स्वास्थ्य संबंधी लाभ यह है कि आदमी गाली के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त कर पाता है। सभ्य भाषा में आदमी को कहना पड़ेगा, ‘भाईसाहब, आपने मेरे साथ उचित व्यवहार नहीं किया।’ लेकिन यही बात गाली एक शब्द में व्यक्त कर देती है। बात दो सेकंड में पूरी हो जाती है। समय भी बच जाता है और भावना भी व्यक्त हो जाती है। आज के तेज रफ्तार युग में इससे बड़ा टाइम मैनेजमेंट और क्या होगा? शायद बनारस के लोग सदियों पहले टाइम मैनेजमेंट सीख गए थे। वहां के लोगों ने गाली को आत्मसात कर लिया है। वहां क्या भाईसाहब, वैâसे हैं नहीं बोलते। लोग कहते हैं, ‘भो… के, वैâसे हो?’ सामने वाला भी भक से कह देता है, ‘भो… के, मैं बिल्कुल ठीक हूं।’ फिर इस शब्द का इस्तेमाल दोनों चाय पीने, पान खाने और बैठकी करने में करते रहते हैं। इसीलिए बनारसियों का हाजमा सही रहता है। उन्हें कोई बीमारी नहीं होती।
सारी बीमारियों का हल
कई डॉक्टरों का तो यह भी दावा है कि गाली सारी बीमारियों का हल है। इसीलिए जो गाली देता है, उसकी खूब चर्चा होती है। वह कभी बीमार नहीं होता है। जो गाली खाता है, वह उससे भी ज्यादा चर्चित हो जाता है। उसका स्वास्थ्य और अच्छा रहता है। गाली उसके लिए टेबलेट का काम करती है। गाली खाकर वह हर छोटी-बड़ी बीमारी दूर कर लेता है। गाली देने वाले से सज्जन पुरुषों की तरह बीमारियां भी दूर भागती हैं। इसीलिए गालीबाज स्वस्थ रहता है।
गाली का अब तो सामाजिक महत्व बढ़ गया है। गाली सामाजिक बराबरी का भी सबसे बड़ा माध्यम है। बड़े आदमी को देखकर हम आदर से बोलते हैं, छोटे आदमी को देखकर आदेश देते हैं और बराबरी वाले से कभी-कभी गाली में बात करते हैं। यानी गाली ने कम-से-कम बातचीत के कुछ क्षेत्रों में लोकतंत्र बचा रखा है। दो दोस्त एक-दूसरे को गाली देकर जितनी आत्मीयता दिखाते हैं, उतनी आत्मीयता कई बार ‘आप’ और ‘जी’ लगाकर भी पैदा नहीं होती। दोनों एक-दूसरे को गाली देकर प्रसन्न रखते हैं। जब मन प्रसन्न रहता है तब शरीर में रक्त प्रवाह सही रहता है। रक्त प्रवाह सही तो कोई बीमारी नहीं।
नया जीवन
सोशल मीडिया ने गाली को नया जीवन दिया है। पहले गाली देने के लिए सामने एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती थी। अब मोबाइल है। सामने वाला दुनिया के किसी भी कोने में हो, गाली एक सेकंड में पहुंच जाती है। इससे दूरी घटती है। संवाद बढ़ता है। उंगलियों की कसरत भी हो जाती है। कई लोग तो सुबह उठकर पहले भगवान को याद नहीं करते, बल्कि सोशल मीडिया खोलकर किसी को गाली देकर दिन की शुरुआत करते हैं। इससे आत्मविश्वास आता है कि आज भी वे लोकतंत्र में सक्रिय नागरिक हैं। राजनीति में तो गाली का महत्व और भी बढ़ गया है। जो नेता ज्यादा गाली देता है या ज्यादा गाली खाता है, वह स्वस्थ तो रहता ही है, लोकप्रिय भी होता है। कई नेता तो खुद को मिलनेवाली गालियों की मार्वेâटिंग करते हैं। खुलेआम कहते हैं, ‘गालियों का सेवन करके मैं स्वस्थ रहता हूं।’ इस तरह की प्रेरक बातें सुनकर दूसरे नेता कल्पना करते हैं, ‘काश लोग मुझे भी गाली देते तो मैं स्वस्थ रहता। दिन के चौबीसों घंटे काम करता। देश में सबसे लोकप्रिय हो जाता।’ मतलब गाली का असली इस्तेमाल हमारे देश के नेता करते हैं।
चुनाव के मौसम में भाषणों में गालियों से तापमान बढ़ता है। नेता जितनी गंभीरता से गालियां देते हैं, उतनी गंभीरता से शायद घोषणापत्र भी नहीं पढ़ते। संसद में तो अदूरदर्शी पूर्वजों ने गाली को असंसदीय भाषा घोषित कर रखा है। सो, लोग संसद के बाहर गाली का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कुछ नेता प्रीविलेज लेकर संसद में गाली दे ही देते हैं। बल्कि कई लोगों का मानना है कि सरकार को गाली को असंसदीय शब्दों की सूची से निकालकर स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों की सूची में डाल देना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक, राजनीतिक विश्लेषक एवंम व्यंग्यकार हैं)

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