कुदरत एक बार फिर महाराष्ट्र के किसानों की जान के पीछे पड़ गई है। पूरे एक महीने से बारिश गायब होने के कारण मराठवाड़ा और विदर्भ समेत राज्य के ज्यादातर हिस्सों पर सूखे का साया मंडरा रहा है। राज्य के ३६ में से ३१ जिलों में बारिश न होने से खेतों में खड़ी फसलों की हालत बदतर हो गई है। खेत झुलसने लगे हैं। कुछ जिलों में महीने भर से बारिश गायब है, तो कुछ जिलों में पूरे डेढ़ महीने से बारिश नहीं हुई है। एकाध बौछार को छोड़कर बारिश के ३० से ४५ दिनों का लंबा विराम लेने से राज्य का किसान बेहाल हो गया है। ‘अल नीनो इफेक्ट’ के कारण इस साल बारिश अमूमन कम ही रहेगी, ऐसी चेतावनी मौसम विभाग ने मानसून से पहले ही दे दी थी। थोड़ी-बहुत कमी हो सकती है, लेकिन अल नीनो का इतना भयानक असर महाराष्ट्र की बारिश पर पड़ेगा, इसका अंदाजा शायद मौसम विभाग को भी नहीं था। महाराष्ट्र के १८ जिलों ने तो इस साल मानसून का अनुभव ही नहीं किया। एक तो इस साल पहले ही मानसून लगभग १५ दिन देर से आया। जून का महीना नाममात्र बारिश का बीतने के बाद जुलाई महीने में बारिश ने जोरदार दस्तक दी। इस वजह से अटकी हुई बुआई पूरे एक महीने की देरी से हुई। मुंबई, पुणे, पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ जिलों और नासिक इलाके में जुलाई महीने में कुछ जगहों पर भारी बारिश हुई। लेकिन अगस्त महीने के पहले हफ्ते से राज्य भर में
बारिश ने जो दूरी बनाई
वह आज तक कायम है। जुलाई महीने की बारिश से फसलें अच्छी लहराने लगी थीं। खेत हरे-भरे हो गए। लेकिन सोयाबीन में फलियां, कपास में डोडें, मक्के में भुट्टे लगने का समय आया, तभी फूल आने के वक्त बारिश गायब हो गई। सोने जैसी फसलें किसानों की आंखों के सामने सूखने लगीं। जिन किसानों के पास कुएं या पानी के स्रोत हैं, उन्होंने जुलाई महीने की बारिश में जमा हुए पानी से खेतों की सिंचाई करने की कोशिश की। लेकिन वह जलभंडार भी खत्म हो जाने से अब फसलों को कैसे बचाएं, यह सवाल किसानों के सामने खड़ा हो गया। सिंचाई की कोई व्यवस्था न होने से सूखी खेती वाले किसानों की तो बदहाली हो गई है। मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ जिलों में सोयाबीन, कपास, मक्का, अरहर, हल्दी की फसलें झुलस गर्इं। उड़द और मूंग भी हाथ से चले गए। लाखों हेक्टेयर की फसलों ने दम तोड़ दिया। अमूमन सावन महीने में बीच-बीच में बारिश की बौछारें पड़ती रहती हैं। लेकिन बीते कई दशकों में यह पहला ऐसा सावन का महीना है, जिसमें एक बूंद भी पानी नहीं बरसा। महीने भर पहले हरे-भरे दिखनेवाले खेत अब बारिश के बिना पीले पड़ गए हैं। सभी फसलों की बढ़ोतरी रुक जाने से किसानों का पैसा तो डूब ही गया, लेकिन खेती लहलहाने के लिए की गई जीतोड़ मेहनत भी मिट्टी में मिल गई। नासिक की बारिश से मराठवाड़ा का जायकवाड़ी बांध भर गया, बस यही एक राहत की बात है। बाकी मांजरा बांध समेत पूरे मराठवाड़ा के छोटे-बड़े बांधों में बेहद कम जलभंडार है। विदर्भ में भी कई छोटी और मध्यम परियोजनाएं पूरी तरह सूखी पड़ी हैं। यानी
पैदावार मारी जाने के साथ-साथ
पीने के पानी का भी गंभीर संकट दरवाजे पर खड़ा है। सूखे के इस दोहरे खतरे को पहचानकर उपलब्ध पानी का नियोजन और सूखा-पूर्व उपाय करने के लिए सरकार को अभी से काम पर लग जाना चाहिए था। लेकिन सब कुछ ठीक-ठीक है, इस अंदाज में हुक्मरान घूम रहे हैं। विदर्भ में इस साल ५० लाख हेक्टेयर, तो मराठवाड़ा में ४८ लाख हेक्टेयर से ज्यादा रकबे पर बुआई हुई। लेकिन बारिश न होने से फसलें झुलस जाने के कारण कई जगहों पर किसानों को खड़ी फसलों पर हल चलाना पड़ा। खरीफ की फसल जमीन में गाड़कर रबी की फसल की तैयारी करें, ऐसा किसानों को लगा; लेकिन सितंबर का पहला हफ्ता बीतने को आया फिर भी बारिश के आसार न दिखने से गेहूं और चने समेत रबी फसलों की बुआई हो भी पाएगी या नहीं, इस चिंता ने अब किसानों को घेर लिया है। ऐन मानसून में ही मवेशियों के चारे का सवाल गंभीर हो गया है। जमीनें यूं ही सूखी पड़ी रहीं तो मवेशियों के चारे के लिए जरूरी मक्का और ज्वार का चारा लाएं कहां से और अगले सात-आठ महीने मवेशियों को कैसे पालें? इसकी फिक्र किसानों को सता रही है। पूरे एक-डेढ़ महीने से बारिश गायब है। ऐन मानसून में ही आधे से ज्यादा महाराष्ट्र सूखे के संकट में फंस गया है। उस पर से आखिरी महीने सितंबर में भी बारिश की मात्रा बेहद कम रहेगी, ऐसा अनुमान मौसम विभाग ने जताया है। अगर वह सच साबित हुआ तो आनेवाले दो महीनों में ९० फीसदी महाराष्ट्र को सूखे की जबरदस्त मार पड़ेगी। अल नीनो के कारण केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देशभर के साढ़े तीन सौ जिलों में अकाल और गंभीर सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। पीने के पानी के साथ-साथ खाद्यान्न की भी अभूतपूर्व किल्लत का सामना करना पड़ेगा, ऐसा मंजर महाराष्ट्र समेत पूरे देश में दिख रहा है। केंद्र और राज्य की डबल इंजन सरकार को सूखे के इस भयानक संकट की कोई परवाह है भी या नहीं?
