fदल्ली लाइव : अरुण कुमार गुप्ता
लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है या सत्ता की नाराजगी मोल लेने का जोखिम? दिल्ली में पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी से सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हुई करीब नौ घंटे की पूछताछ ने यह सवाल फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। पूर्व वरिष्ठ अधिकारी आशीष जोशी का कहना है कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की पूछताछ के दौरान अधिकांश सवाल उनके सोशल मीडिया पोस्ट और उससे जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रहे। जोशी ने दावा किया है कि उनके और उनके वकीलों को एफआईआर की प्रति भी उपलब्ध नहीं कराई गई। जोशी ने इससे पहले आरोप लगाया था कि उन्हें मॉर्निंग वॉक के दौरान पूछताछ के लिए ले जाया गया और लंबे समय तक उनके परिवार को उनकी स्थिति की जानकारी नहीं मिल सकी। बड़ा सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक या संवैधानिक सवाल उठाने वाले लोगों के मामलों में जांच की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। आशीष जोशी का मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामले और कानूनी कार्रवाई को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर यह भी पूछा है कि कानून का इस्तेमाल सभी पक्षों के खिलाफ समान मानकों से होगा या नहीं। लोकतंत्र की ताकत सवालों को दबाने में नहीं, बल्कि सवालों का जवाब देने में होती है। आशीष जोशी प्रकरण अब केवल एक पूर्व नौकरशाह की पूछताछ का मामला नहीं रह गया है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक बन गया है कि देश में सत्ता से असहमत होने, सवाल पूछने और सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करने की आजादी की वास्तविक सीमा आखिर कहां तक है।
कटघरे में चुनावी व्यवस्था!
चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर देश में जारी राजनीतिक बहस को पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने नया और गंभीर मोड़ दे दिया है। लवासा का सवाल सीधा है। अगर कोई प्रक्रिया कानूनी है, तो क्या वह अपने आप न्यायसंगत भी हो जाती है? लवासा ने मतदाता सूचियों से १३ करोड़ नाम हटाए जाने के मुद्दे पर सवाल उठाया और कहा कि कानून की सिर्फ शब्दशः व्याख्या पर्याप्त नहीं है; संस्थाओं को कानून की भावना और न्याय के व्यापक सिद्धांतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसी व्यापक प्रक्रिया से लोगों में अपने संवैधानिक मतदान अधिकार को लेकर चिंता और असुरक्षा बढ़ सकती है। यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना निश्चित रूप से जरूरी है। मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नाम हटाना चुनावी व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन यदि इस सफाई अभियान में वास्तविक मतदाता भी बाहर हो जाएं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? लवासा ने चिंता जताई कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद केवल यह कहना पर्याप्त नहीं हो सकता कि प्रभावित व्यक्ति दोबारा आवेदन कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में पहले से बड़ी संख्या में लोग मतदान नहीं करते और ऐसी व्यापक संशोधन प्रक्रिया लोगों को लोकतांत्रिक व्यवस्था से और दूर कर सकती है। विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया का असर कुछ विशेष वर्गों या राजनीतिक रूप से कमजोर मतदाता समूहों पर अधिक पड़ सकता है। पूर्व चुनाव आयुक्त की टिप्पणी को केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब चुनावी व्यवस्था से जुड़े पूर्व संवैधानिक पदाधिकारी ही प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं, तो जवाबदेह संस्थाओं को अधिक पारदर्शिता से जवाब देना चाहिए।
