-लोकतंत्र की सूची से जनता ही गायब तो चुनाव किसके लिए?
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की मतदाता सूची को लेकर उठे सवाल अब केवल चुनाव आयोग की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गए हैं। बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड में कथित विसंगतियां और अनमैप्ड विवरण सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में चिंता बढ़ गई है। रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई के करीब ३१ प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच और नोटिस प्रक्रिया का मुद्दा चर्चा में है।
सवाल सीधा है, जिस शहर को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, वहां मतदाता सूची जैसी बुनियादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतनी बड़ी संख्या में रिकॉर्ड संबंधी समस्याएं आखिर कैसे सामने आर्इं?
मतदाता का नाम सुरक्षित या व्यवस्था के भरोसे?
चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है और मतदाता सूची उसकी बुनियाद है। लेकिन यदि आम नागरिक को चुनाव से पहले यह चिंता सताने लगे कि उसका नाम सूची में है या नहीं, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मुंबई जैसे महानगर में लाखों लोग रोजगार के लिए एक इलाके से दूसरे इलाके में जाते हैं। किराये के मकान बदलते हैं, पते बदलते हैं और दस्तावेजों में बदलाव होते हैं। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वास्तविक मतदाता का अधिकार किसी तकनीकी गड़बड़ी की भेंट न चढ़े। लेकिन अब सवाल यह है कि जिन लोगों को नोटिस मिलेंगे, क्या सभी मतदाता समय पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे? मतदाता सूची में बड़ी संख्या में विसंगतियों का मामला विपक्ष के लिए सरकार और चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाने का बड़ा मुद्दा बन सकता है। विपक्ष पहले से ही चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठाता रहा है।
