मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाहिंदी गजल-मेरी काया को सहलाती रहे बस

हिंदी गजल-मेरी काया को सहलाती रहे बस

मेरी काया को सहलाती रहे बस
वो पुरवैया पवन आती रहे बस

भला क्यों सौत लाऊंगा मैं उसकी
वो उलझी गांठ सुलझती रहे बस

मैं उसके झूठ को सच मान लूंगा
शपथ झूठी सही, खाती रहे बस

मैं पलकों से डगर उसकी बुहारूं
वो मुझसे काम करवाती रहे बस

उसे पाना नहीं बस देखना है
वो केसरिया घटा छाती रहे बस

दरस होते हैं तो जलते हैं दीपक
दरस नयनों को दरसाती रहे बस।

-(बहुभाषी शायर नवीन सी चतुर्वेदी)

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