राजन पारकर
नवरात्रि आने वाली है। देवी विराजेंगी, आरती होगी, ढोल-ताशे बजेंगे और गरबा-डांडिया की धूम मचेगी। लेकिन महाराष्ट्र में इस बार चर्चा डांडिया से ज्यादा धर्म-जांच की है। विश्व हिंदू परिषद की सामने आई नियमावली में मुस्लिमों को गरबा-डांडिया कार्यक्रमों में प्रवेश न देने, पहचान जांचने और हिंदू प्रतिभागियों के माथे पर तिलक लगाने जैसी बातें कही गई हैं। यानी अब गरबा मैदान के दरवाजे पर डांडिया से पहले पहचान-पत्र की परीक्षा!
भारत चांद पर पहुंच गया, डिजिटल इंडिया दुनिया को दिशा दिखा रहा है और हम यह तय करने में उलझे हैं कि कौन गरबा खेल सकता है और कौन नहीं। वाह रे तरक्की!
धार्मिक आयोजन की पवित्रता बनाए रखना आयोजकों का अधिकार है। सुरक्षा की चिंता है तो सुरक्षा बढ़ाइए, छेड़छाड़ या अपराध होता है तो अपराधी पर कार्रवाई कीजिए। लेकिन किसी अपराधी की जगह उसके धर्म को कटघरे में खड़ा करना कितना जायज है? अगर पूजा है तो पूजा कीजिए, सांस्कृतिक उत्सव है तो संस्कृति मनाइए; मगर उत्सव को पहचान-परीक्षा बना देना सवाल तो खड़े करेगा ही।
तिलक श्रद्धा का प्रतीक है, चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं। ईमानदारी माथे पर नहीं, कर्म में दिखाई देती है। इंसानियत किसी पहचान-पत्र की मोहताज नहीं होती।
डांडिया की दो लकड़ियां टकराती हैं, मगर ताल बनाती हैं, दीवार नहीं। समाज को भी यही सीख चाहिए-मतभेद हों, मनभेद नहीं।
और असली गपशप चुनावी गलियारों में है। त्योहार, पहचान, ध्रुवीकरण और वोटों का गणित-कहीं डांडिया के साथ चुनावी कैलकुलेटर तो नहीं चल रहा? किसे अंदर रखना है, किसे बाहर और किस मुद्दे से माहौल गरमाना है, यह सवाल जनता से ज्यादा राजनीतिक गलियारों को परेशान करता दिखाई देता है।
नवरात्रि शक्ति और आस्था का पर्व है। इसे पहचान की राजनीति का अखाड़ा बनाने की जरूरत नहीं। आखिर माता के दरबार में भक्त चाहिए या पहचान-पत्र?
बस, यही है आज की गपशप!
