प्रधानमंत्री मोदी धड़ाधड़ झूठ बोलते हैं, इस बात पर अब राष्ट्रीय सहमति बन चुकी है। मोदी जी ने एलान किया है कि २०१३ के `नीतिगत लकवे’ (पॉलिसी पैरालिसिस) की हालत से बाहर निकलकर भारत ने नीतिगत तेजी की दिशा में एक लंबी छलांग लगाई है। उनका दावा है कि २०१३ में भारत की गिनती दुनिया की पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं में होती थी, लेकिन आज भारत ७.८ प्रतिशत की विकास दर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है। मोदी जी आज भी २०१३ के दौर में ही रेंगते और हाथ-पांव मारते दिख रहे हैं; यह उनके मन की कमजोरी को दर्शाता है। मोदी अपने दौर की तेजी और तरक्की का `डीजे’ तो खूब बजाते हैं, लेकिन आजादी के ७५ साल बाद भी हाथ से मैला साफ करने की प्रथा को वे अपने २०१३ से २०२६ तक के कार्यकाल में बंद नहीं करा सके हैं। अब इस अमानवीय प्रथा को लेकर मुंबई हाई कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। मोदी जी के राज में `इसरो’ के हजारों वैज्ञानिक नौकरी छोड़कर चले गए। १७ हजार मध्यम और बड़े उद्योगपतियों ने देश छोड़ दिया। मोदी गुट के ज्यादातर उद्योगपतियों ने बैंकों का कर्ज डुबोया और बाद में उनका वह कर्ज माफ भी कर दिया गया। सुभाष चंद्र गोयल ने तो एलआईसी को १,३२२ करोड़ रुपए का चूना लगाया और इस `चूने’ को मोदी जी ने मंजूर भी कर लिया। मोदी जब इस तरह अमीरों के चोंचले पूरे कर रहे हैं, तब देश का दलित और शोषित तबका जिंदा रहने के लिए हाथ से मैला साफ करने का काम करने पर मजबूर है। फिर मोदी किस तरक्की की डींगें हांक रहे हैं? हम चांद पर यान भेजते हैं, इसका श्रेय तो मोदी तुरंत लपक लेते हैं। फिर हाथ से मैला साफ करने का यह कड़वा सच और जाति व्यवस्था का यह सामाजिक दुश्चक्र जो आज भी कायम है, उसका क्या? देश के कुछ नागरिकों को इंसानियत के दर्जे से भी
नीचा काम करने पर मजबूर
किया जा रहा है, इसकी जिम्मेदारी मोदी जी को लेनी ही चाहिए। मुंबई हाई कोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की बेंच ने १३ अगस्त २०२६ को दिए पैâसले में जो टिप्पणियां की हैं, वे बेहद विचलित करने वाली हैं। मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसायटी में सेप्टिक टैंक साफ करते वक्त `सूरज माधवी’ नाम के एक युवा सफाई कर्मचारी की मौत हो गई। सूरज टैंक के भीतर दम घुटने से मर गऐ। इस पर `श्रमिक जनता संघ’ और मृतक के पिता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर न्याय मांगा और सरकार से मुआवजे की मांग की। लेकिन सरकार और ठेकेदारों की तरफ से हीला-हवाली शुरू हो गई। कानूनन हाथ से मैला उठाने पर सख्त पाबंदी होने के बावजूद महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में यह अमानवीय काम धड़ल्ले से जारी है। अब सूरज माधवी मामले में अदालत ने साफ निर्देश दिए हैं: `मृतक के परिवार को ३० लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए। इस तरह का काम करते वक्त अगर किसी कर्मचारी की मौत होती है, तो उसके परिवार को राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन तुरंत मुआवजा दे और बाद में यह रकम संबंधित सोसायटी, ठेकेदार या मालिक से वसूल करे। `मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में सेप्टिक टैंक में उतरकर मैला साफ करते वक्त सैकड़ों लोग अपनी जान गवां चुके हैं। मोदी के अपने गुजरात में भी इस तरह की मौतें हुई हैं, फिर भी यह बेरहम तरीका बंद नहीं हुआ। फडणवीस-मोदी विकास, तरक्की और तेजी की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन सार्वजनिक शौचालयों, सरकारी अस्पतालों और दफ्तरों के पाखानों की हालत नरक से भी बदतर है। और विडंबना देखिए, यह सफाई आज भी हाथों से ही कराई जाती है और समाज के
एक खास वर्ग को ही
आज भी यह गंदा काम करना पड़ता है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, `हमारी लड़ाई धन या सत्ता के लिए नहीं है, वह तो मानवीय गरिमा पाने के लिए है।’ लेकिन यह इज्जत मैला ढोने वाले मजदूरों को आज तक नहीं मिल सकी। इंसान चांद पर पहुंच गया, लेकिन भारत का इंसान आज भी हाथों से मैला साफ कर रहा है। गंदगी से भरे `टैंक’ में उतरता है और घुट-घुटकर मर जाता है। यह एक खौफनाक हकीकत है। तो फिर प्रधानमंत्री मोदी किस आर्थिक तेजी की गप्पें मार रहे हैं? यह तो एक तरह से जाति व्यवस्था की ही `तरक्की’ है! सीवर और शौचालय साफ करने की आधुनिक तकनीकें मौजूद होने के बावजूद भारत में यह काम आज भी हाथों से कराया जा रहा है और इसके जरिए एक खास जाति-व्यवस्था का शोषण हो रहा है। `आजादी के ७९ सालों में क्या नहीं हुआ’, प्रधानमंत्री अपनी यह बकवास अब बंद करें! वे सिर्फ यह बताएं कि उनके १२ सालों के राज में हाथ से मैला साफ करने की यह कुप्रथा खत्म क्यों नहीं हुई? मोदी भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना अमेरिका और यूरोप जैसे मुल्कों से करते हैं, लेकिन हाथ से मैला साफ करने की यह घिनौनी प्रथा उन देशों में नहीं है। यह आज भी बुर्किना फासो, पाकिस्तान, बांग्लादेश, बोलीविया, युगांडा, हैती और जाम्बिया जैसे देशों में चल रही है। यानी बर्बरता और अमानवीयता के मामले में मोदी का भारत इन पिछड़े मुल्कों से होड़ ले रहा है! यूरोप, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया में सेप्टिक टैंक `वैक्यूम ट्रक’ से खाली किए जाते हैं; वहां मजदूरों को गंदे टैंक में नहीं उतारा जाता। अपने अगले विदेश दौरे पर मोदी जी को यह सब जरा करीब से देखकर आना चाहिए और उसके बाद ही जीडीपी की तरक्की का ढोल पीटना चाहिए। मैला ढोने वालों के इस दर्द को दुनिया के सामने लाने के लिए मुंबई हाई कोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे का बहुत-बहुत अभिनंदन!
