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ईस्ट इंडिया कंपनी का डिजिटल अवतार!

 -पूर्व सीडीएस अनिल चौहान की चेतावनी-कल जमीन नहीं, भारत के दिमाग और डेटा पर हो सकता है कब्जा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, लेकिन धीरे-धीरे व्यापार सत्ता में बदला और सत्ता ने पूरे देश के संसाधनों पर कब्जा कर लिया। अब करीब ढाई सौ साल बाद इतिहास का वही डर एक नए रूप में सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हाथ में तलवार नहीं, एआई, डेटा और एल्गोरिदम होंगे।
पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने चेताया है कि ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियां भविष्य की नई ‘ईस्ट इंडिया कंपनियों’ की अग्रदूत बन सकती हैं। उनके मुताबिक ताकत का अगला चरण जमीन पर कब्जे से आगे बढ़कर संसाधनों, डेटा और अंतत: मानव सोच को प्रभावित करने तक पहुंच सकता है।
जमीन नहीं, डेटा सबसे बड़ा संसाधन!
भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में शामिल है। ऐसे में सवाल सिर्फ एआई इस्तेमाल करने का नहीं, बल्कि यह है कि डेटा किसके पास रहेगा, मॉडल किसके होंगे, कंप्यूटिंग शक्ति किसके नियंत्रण में होगी और एल्गोरिदम किसके नियमों पर चलेंगे?
यदि शिक्षा, कारोबार, प्रशासन, मीडिया, रक्षा और नागरिक जीवन धीरे-धीरे विदेशी डिजिटल प्रणालियों पर निर्भर हो गए तो भारत की रणनीतिक और तकनीकी स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होंगे। पुरानी गुलामी में विदेशी झंडा दिखाई देता था। नई डिजिटल निर्भरता में न झंडा होगा, न सेना—सिर्फ स्क्रीन, सर्वर और एल्गोरिदम होंगे।
कंपनी वही, हथियार नया!
ईस्ट इंडिया कंपनी के पास व्यापार के साथ सेना और राजनीतिक प्रभाव था। आज की टेक कंपनियों के पास सेना नहीं, लेकिन अरबों लोगों की डिजिटल गतिविधियों से पैदा होने वाला डेटा और उसे समझने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। लोग क्या पढ़ते हैं, क्या खरीदते हैं, किस खबर पर प्रतिक्रिया देते हैं और किस तरह की जानकारी उन्हें प्रभावित करती है, डिजिटल दुनिया इन व्यवहारों का विशाल रिकॉर्ड तैयार कर रही है। यही वह मोड़ है जहां ‘कॉग्निटिव कॉलोनियलिज्म’ यानी मानसिक और बौद्धिक औपनिवेशवाद का खतरा चर्चा में आता है।

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