मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : क्या सत्ता को अपनी विदाई का आभास हो चुका है?

रुख-ए-सियासत : क्या सत्ता को अपनी विदाई का आभास हो चुका है?

तौसीफ कुरैशी

सत्ता जब मजबूत होती है तो उसे अपने ही देश में अपने ही लोगों से मिलने के लिए गुप्त पार्विंâग, बंद रास्ते और पुलिस के सुरक्षा घेरे नहीं चाहिए होते। सत्ता जब आश्वस्त होती है तो उसे अपने उत्तराधिकारी की तस्वीर विदेशी अखबारों से बनवाने की बेचैनी भी नहीं होती। मगर आज के संकेत कुछ और कहानी कह रहे हैं।
पंजाब में मोदी सरकार का प्रस्तावित आउटरीच कार्यक्रम अचानक रद्द हो गया। बताया गया कि मंत्रियों की पर्ची नहीं निकालने वाले शिवराज चौहान और पर्ची से अचानक शिक्षा मंत्री बने प्रह्लाद जोशी का दौरा होना था। हाईवे से आठ किलोमीटर भीतर सौ गाड़ियों की पार्विंâग तक की व्यवस्था खोजी जा रही थी। सवाल यह है कि किसानों से संवाद करने जा रही सत्ता को इतनी छिपी हुई तैयारी की जरूरत क्यों पड़ गई? क्या डर इतना बढ़ गया है कि बातचीत से पहले लाठियों की आहट सुनाई देने लगी?
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के बाद कौन इस प्रश्न को लेकर विदेशी अखबारों में योगी आदित्यनाथ की तस्वीर उछालने की कोशिशें चल रही हैं। मगर उत्तराधिकारी की खोज तब शुरू होती है, जब वर्तमान नेतृत्व के भविष्य को लेकर बेचैनी घर कर जाती है। और तभी द इकोनॉमिस्ट मोदी के लालकिले वाले भाषण दिमागी नक्सल पर सवाल उठाता है। अरुणाचल में चीनी घुसपैठ की खबरें दबाने पर भी दबती नहीं हैं। कहते हैं जब हालात विपरीत दिशा पकड़ लेते हैं तो ऊंट पर बैठे भी सुरक्षित नहीं रहते हैं। जिस गुजरात मॉडल (जो था ही नहीं) को दिखाकर देश को मूर्ख बनाया गया था, उसी गुजरात की सबसे बड़ी शुगर कोऑपरेटिव में १५ में से १४ सीटों पर किसान परिवर्तन पैनल धमाकेदार जीत से कब्जा कर लेते हैं। यह सब अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये उस जमीन की दरारें हैं, जिन पर झूठ और पाखंड से सत्ता का विशाल महल खड़ा किया है। राजनीति में सबसे बड़ा संकट हार नहीं, हार का आभास होता है। क्योंकि उसी दिन से दरबार में उत्तराधिकारी तलाशे जाते हैं, तस्वीरें गढ़ी जाती हैं और असली सवालों से बचने के लिए नए तमाशे खोजे जाते हैं। सितंबर आखिर में ब्रिक्स सम्मेलन की फोटो शायद बहुत चमके। मगर सवाल फोटो का नहीं, प्रâेम के बाहर खड़ी आक्रोशित जनता का है। अगर जनता ने मन बना लिया है तो दुनिया के सबसे बड़े वैâमरे की सत्ता की विदाई कोई रोक नहीं सकता। सत्ता को शायद पहली बार आईना दिखने लगा है और आईने में चेहरा पहले जैसा नहीं दिख रहा। सत्यमेव जयते

अन्य समाचार