मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गाँव: हां! ऐसा ही है अपना गांव

काहें बिसरा गाँव: हां! ऐसा ही है अपना गांव

धूप बहुत तेज थी पर झूलन को उनके संकल्प से डिगा नहीं पा रही थी। उनको अपने जीजा के मदद हेतु, गेहूं का बोझा बंधाने हेतु खेत में जल्दी से पहुंचना था, सो वो लफार मारे भगे जा रहे थे। गड़ही पार करने के बाद बगैचा में आम भी खाने को मिल गया था। गांव के लगभग सभी बच्चे ममा से घुले-मिले थे। रास्ते में कई मिले भी और दौड़ कर पांव भी छूए, ममा को रोकने का प्रयास भी किए, पर ममा, झूलन ममा को केवल और केवल ताल, गेहूं और बोझा ही नजर आ रहा था। रेडियो में सदाबहार गाने जब भी बजने लगता आवाज पूरे गांव तक फ़ैल जाती थी, सुनने वाले जहां भी होते थे वहीं रुक जाते थे, आज भी बज रहा था पर ममा सबसे अलग थे, उबड़-खाबड़ रास्ते से गुजरते हुए अब तारा पर पहुंच गए थे। यहां भी चारों तरफ लोग अपने खेतो में जमें हुए थे। गांव यही है, गांव के लोग भी ऐसे ही है। पहले भी ऐसे ही थे। तारा के आगे बढ़ते ही तीसरा खेत सुनहरी अइया का था। हिंकई ददा, सुनहरी अइया अउर नाति बबलू सब खेत से बोझा ढोने में लगे हुए थे। अइया बेचारी इस उमर में भी लगी हुई थी, ददा का बोझ बबलू उठवाता था और बबलू का बोझ अइया। उसके बाद जब तक दोनों, बोझा को मशीन तक पहुंचा कर लौटते तब तक अइया खेत में गिरे गेंहू को बीनती रहती थी। अभी भी बिन ही रही थी कि झूलन दिखाई पड़ गए। पसीने से तर-बतर अइया झूलन को देखते ही मगन हो गई। ‘अरे भइया झूलन,.. तूं कब आयऽ होऽ?’ हंसते हुए अइया बोल पड़ी। ममा दौड़ कर अइया के पांव छू लिए, हांथ सिर के पास तक ले गये और बोले- ‘अबइ अउतइ हई अइया, आए हऽ, खाए हऽ तब तक पता लाग जीजा हरेन यंह लपटियान हयेन त चला आए’। ‘हां वह अहत गयेन, बाप-बेटवा, कब्बइ के लपटियान हयेन बेचारे, ई गर्मी त जना जिउ लेइ लेये, लेकिन मनई का करइ बेटवा, कमवउ त बाऽ, करइ के त पड़बइ करे। नाहि त फेरि साल भरि काउ खवाए लाल? हाथ दहिने ओरी थोड़ी दूर अपने खेतों में लगे झूलन के जीजा मगन को दिखाते हुए अइया बोली।
‘हां कहत त सहियइ हऊ अइया, बिना खेती कहां कुछ उपरि पाए, इहइ त शान हउ आपन सभेन कऽ। अउर तूं ठीक बाटू? कहऽ त कुछ मदद कइ देइ…।
‘नाही भइया तूं रहइ दऽ, ओइसउ अब त कुलि निपटिनि गऽ बाऽ, बा रच्चइ कऽ। जाऽ तुं पहिले ओनकर बेचारु हरेन कऽ मदद करऽ, बेचारू हरेन परेशान होइ गऽ होइहंइ’। ‘ठीक बाऽ अइया… हम चल्थई फेरि’- कहते हुए ममा आगे बढ़ गये‌‌। उधर बाप बेटवा बोझा भले ही बांध रहे थे पर मुकेश का मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा था उसे रह-रह कर दोस्त और उनके खेल याद आ रहे थे- ‘रामू डंडा से टयेर चलावत होए त, बिक्किया, रोहिता, रमेशवा मैच खेलत होइहंइ.. बेचारा मन मसोस कर भी लगा हुआ था और रह-रह कर गांव की ओर भी देख ले रहा था। ताल में दूर-दूर तक केवल और केवल खेत ही नजर आ रहा था कहीं एकाध दो पेड़ भी दिख जा रहे थे बस। पर हां, अक्सर जो खेत खाली और शांत पड़े रहते थे अब एकदम गुलजार थे एक-दो खेतों को छोड़कर लगभग सभी में लोग लगे हुए थे। मुकेश हताश हो फिर गांव की ओर देखने लगा था कि उसकी आंखें चमक उठींऽ। पापा.. पापा.. हेवा ममा आइ गयेन… कहते ही मुकेश दौड़ पड़ा, भागते हुए ममा के कदमों पर झुक गया, ममा उसे उठाकर गले से लगा लिए और हंसते हुए पूंछने लगे- का होऽ लाल, अत्याचार होत बाऽ तोहरे साथे नऽ.. चल हम आइ गऽ हई अब देर नऽ लागे। जीजा से भी पैलगी-असीस के बाद अब ममा जी जान से लग गये थे और दनादन बोझ बांधे जा रहे थे। धूप की दिशा बदल गई पर ममा लगे रहेऽ। मगन कई बार कहेऽ कि ‘अब बसि करऽ यार, कालि होइ जाए, नाहि त संझा कि होइ जाए’ पर ममा कहां मानने वाले थे हां भैने को खाने के लिए घर भेज दिए थे बाकी जीजा मगन से बोल दिए थे कि ‘एक दिन खाइ में रचि के देर होइ जाए त जिउ न चलाऽ जाए, अब आज हम कुलि बोझ बंधवाए के बादइ सांस लेब जीजा’। मगन भी अब जी-जान से जुट गये थे

-पंकज तिवारी
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं
कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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