भारत की मौजूदा चुनाव प्रणाली पर अब किसी का विश्वास नहीं रह गया है। भारत का चुनाव आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक न रहकर लोकतंत्र के हत्यारे के रूप में सत्ताधारियों के मंच पर घूम रहा है। मोदी, शाह और मौजूदा भारतीय जनता पार्टी को जीत दिलाने में चुनाव आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भाजपा की विजय यात्रा में ‘ईवीएम’ का योगदान अहम है। इसलिए ‘ईवीएम’ प्रणाली को रद्द करके चुनाव ‘बैलेट पेपर’ यानी मतपत्र से कराने की मांग जोर पकड़ रही है, लेकिन चुनाव आयोग कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है। अब एक नई खबर सामने आई है। २०२९ में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले लगभग पांच लाख ‘ईवीएम’ बदली जाएंगी और पांच लाख मतदान केंद्र भी बढ़ाए जाएंगे। पांच लाख ‘ईवीएम’ पुरानी होने के कारण इस कबाड़ को बदला जा रहा है। पांच लाख पुरानी ‘ईवीएम’ को कबाड़ में फेंकने के बजाय अगर ‘ईवीएम’ पर आधारित चुनाव प्रणाली को ही कबाड़ में फेंक दिया जाए, तो हमारे लोकतंत्र और भारतीय जनता पर उपकार होगा। ‘मशीनें’ बदलेंगी यह सच है, लेकिन नई मशीनों में भी अगर ‘कोई भी बटन दबाओ, वोट कमलाबाई को ही जाएगा’ यही डिजिटल प्रोग्राम सेट किया गया होगा, तो सारा किया-धरा फिर से कबाड़ में ही जाएगा। ‘ईवीएम’ व्यवस्था ने भारतीय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। लोगों के मन में संशय है और यह यकीन भी है कि हम जिसके नाम के आगे का बटन दबाते हैं, उसे हमारा वोट नहीं मिलता। वोट सिर्फ कमलाबाई को जाता है। यह
संशय अगर मतदाताओं के मन
में ही है, तो इस ‘ईवीएम’ के डिब्बे का इस्तेमाल किसलिए करना? ‘ईवीएम’ के जरिए हर मशीन पर दस प्रतिशत वोट ‘मैनेज’ किए जाते हैं, इस संदेह को मजबूती देने वाले नतीजे पिछले दस सालों में आए हैं। खासतौर पर जहां कमलाबाई को पांच-पच्चीस वोट मिलने की संभावना भी नहीं होती, वहां उन्हें हजारों वोट मिलते हैं, यह आश्चर्यजनक है। ‘ईवीएम’ सार्वजनिक उपक्रमों के जरिए बनती हैं और इन उपक्रमों पर अब भाजपा का नियंत्रण है। ईवीएम, एसआरआई जैसे उद्योगों के जरिए भाजपा चुनाव जीतती है, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है। कई मतदान केंद्रों पर लंबी-लंबी कतारें लगी होने के बावजूद कुछ खास बूथों की ‘ईवीएम’ बंद पड़ जाती हैं। वे चार-पांच घंटे तक ठीक नहीं होतीं। इस वजह से मतदाता तंग आकर चले जाते हैं। मतदाता जैसे ही तितर-बितर होते हैं, ‘ईवीएम’ चालू हो जाती हैं और उन पर डाका डाला जाता है। ‘ईवीएम’ चालू रहने के दौरान बिजली चले जाना जैसे वाकये अक्सर होते हैं। ईवीएम की मतगणना में भी गड़बड़ी होती ही है। कमलाबाई का उम्मीदवार अगर पीछे चल रहा हो, तो निश्चित रूप से मशीन ख़राब कर दी जाती है, बिजली गुल करके अंधेरा कर दिया जाता है, यह तो है ही, लेकिन जहां इन ‘ईवीएम’ को मतदान के बाद रखा जाता है, वहां भी सुरक्षा का जनाजा निकल जाता है। कभी ‘ईवीएम’ खुले में पड़ी मिलती हैं, तो कभी कुछ और ही सामने आता है। इसलिए मतपत्र ही एकमात्र सुरक्षित और भरोसेमंद जरिया है। आज भी दुनिया में हर जगह मतपत्रों पर चुनाव कराए जाते हैं और ‘ईवीएम’ प्रणाली को खारिज कर दिया गया है। फिर हर बात में दुनिया से आगे होने का दिखावा करने वाले मोदी जैसे लोग इस पिछड़े और
कबाड़ ईवीएम का
इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? ईवीएम के खिलाफ दिल्ली के वकीलों ने आर-पार की लड़ाई शुरू कर दी है। ईवीएम के खिलाफ और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने एक बड़े आंदोलन का ऐलान किया है। देश के नामचीन वकील इस आंदोलन में शामिल होने वाले हैं। ईवीएम और वीवीपीएटी प्रणाली की पारदर्शिता पर वकीलों ने गंभीर कानूनी आपत्ति जताई है। मैंने किसे वोट दिया और मेरा दिया हुआ वोट उसी व्यक्ति को जा रहा है या नहीं, यह जानने का अधिकार हर मतदाता को है। ‘ईवीएम’ में ये दोनों अधिकार छीन लिए गए हैं। लोकतंत्र में हर नागरिक का मतदान पर विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया में ‘एक वोट, एक अधिकार’ के मूल्य की रक्षा ‘बैलेट पेपर’ के माध्यम से ही हो सकती है, ऐसा दावा वकीलों के संगठन ने किया है। ‘जंतर-मंतर’ पर सफल आंदोलन के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने भी ‘ईवीएम’ घोटाले का मुद्दा पकड़ रखा है। ‘ईवीएम’ के खिलाफ एक जन-आंदोलन खड़ा हो रहा है, ऐसे में चुनाव आयोग ने पांच लाख नई ‘ईवीएम’ खरीदने का फैसला किया है। यह मनमानी है। मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चाटुकार हैं। वे खुद एक तानाशाह हैं। इसलिए निष्पक्ष, पारदर्शी चुनाव और लोकतंत्र के मूल्यों जैसी नैतिक बातों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। फिर भी जनभावना का दबाव इतना जबरदस्त है कि नई पांच लाख ‘ईवीएम’ को भी कबाड़ में ही फेंकने की नौबत उन पर आएगी!
