मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : स्वतंत्र की स्वतंत्रता पर न्याय के दोहरे पैमाने का सवाल

पॉलिटिका : स्वतंत्र की स्वतंत्रता पर न्याय के दोहरे पैमाने का सवाल

-के.पी. मलिक

स्वतंत्र भारद्वाज को मिली तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत को केवल एक व्यक्ति की कानूनी राहत मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े मारपीट के मामले में अंतरिम राहत दी है; मामले में जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
सवाल
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है कि क्या भारत में जमानत का प्रश्न केवल अदालत के एक आदेश का सवाल है या यह उस पूरी व्यवस्था का आईना है जिसमें किसी नागरिक की स्वतंत्रता, उसकी सामाजिक हैसियत, उसके खिलाफ लगे आरोप, कानून की धाराएं और उसके मामले में पैदा होने वाला सार्वजनिक दबाव, सब मिलकर उसकी जिदगी तय करते हैं?
यही कारण है कि स्वतंत्र भारद्वाज की अंतरिम जमानत को किसी एक पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने के बजाय भारतीय जेल और न्याय व्यवस्था की व्यापक तस्वीर के भीतर देखना चाहिए। सबसे पहले एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है, आरोपी और दोषसिद्ध व्यक्ति एक ही चीज नहीं हैं। विचाराधीन कैदी के खिलाफ आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुए होते, फिर भी जेल की सलाखें उसके लिए वास्तविक होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के २०२४ के आंकड़ों के मुताबिक, देश की जेलों में ३,७१,४४० विचाराधीन कैदी थे। सरकार ने भी माना है कि गरीब कैदियों के लिए जमानत की राशि जुटाना एक वास्तविक समस्या है और इसी कारण ‘गरीब कैदियों को सहायता’ योजना चलाई जा रही है। यानी कानून की किताब में स्वतंत्रता एक अधिकार हो सकती है, लेकिन जमीन पर जमानत पाने की क्षमता अक्सर पैसे, वकील, प्रक्रिया और समय से जुड़ जाती है।
यहीं से अगला सवाल मीडिया से पूछा जाना चाहिए कि जब स्वतंत्र भारद्वाज को जमानत मिलती है तो बहस होती है। होनी भी चाहिए। लेकिन क्या यही संवेदनशीलता हर उस व्यक्ति के मामले में दिखाई देती है, जो वर्षों से विचाराधीन कैदी है? क्या कमरे अदालत के दरवाजे पर दस्तक सिर्फ उन्हीं मामलों में देते हैं, जिनमें राजनीतिक तापमान अधिक हो? क्या जेल में बंद व्यक्ति की पहचान, उसकी विचारधारा, धर्म, जाति, संगठन या राजनीतिक लोकप्रियता मीडिया की भाषा और जनता की प्रतिक्रिया को प्रभावित करती है? न्याय व्यवस्था का पैमाना अगर व्यक्ति की पहचान से बदलने लगे, तो फिर कानून की समानता केवल संविधान की किताब में सिमटकर रह जाएगी।
जवाबदेही
उमर खालिद और शर्जील इमाम के मामलों को भी इसी संदर्भ में देखना होगा। जनवरी २०२६ में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को जमानत देने से इनकार किया था और उसी फैसले के आधार पर जुलाई २०२६ में निचली अदालत ने उनकी नई जमानत अर्जियां भी खारिज कीं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मामला समान है; कानून स्वयं अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग कसौटियां निर्धारित करता है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या उन कसौटियों का इस्तेमाल सभी मामलों में समान, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से हो रहा है?
दूसरी तरफ डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम का उदाहरण इस बहस को और असहज बनाता है। दोषसिद्ध कैदी होने के बावजूद उन्हें २०२६ में भी बार-बार पैरोल और फरलो मिली। अगस्त २०२६ में मिली २१ दिन की फरलो, वर्ष २०२० के बाद उनकी १७वीं अस्थायी रिहाई थी। सवाल यह नहीं कि कानूनन पात्र व्यक्ति को पैरोल क्यों मिली; असली सवाल यह है कि क्या अस्थायी रिहाई की यह व्यवस्था एक सामान्य कैदी के लिए भी उतनी ही सुलभ और पारदर्शी है? बिलकिस बानो मामले ने भी इस बहस को गहरा किया था, जब २०२४ में सुप्रीम कोर्ट ने ११ दोषियों की समय-पूर्व रिहाई (माफी) को रद्द करते हुए गुजरात सरकार के आदेश को शक्ति का अवैध इस्तेमाल माना था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत एक छात्र की हिरासत को रद्द करते हुए अदालत ने प्रशासनिक शक्ति के दुरुपयोग पर चिंता जताई और एक ‘ऑरवेलियन दमनकारी समाज’ की आशंका व्यक्त की। अदालत ने अधिकारियों को संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह रहने की नसीहत दी। यह टिप्पणी लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं, बल्कि इस बात से चलता है कि असहमति रखने वाले नागरिक के साथ कानून वैâसा व्यवहार करता है।
मीडिया की भूमिका यहां सबसे कठिन है। मीडिया का काम फैसला सुनाना नहीं, बल्कि प्रक्रिया पर रोशनी डालना है। अगर स्वतंत्र भारद्वाज की जमानत खबर है, तो जेलों में सड़ रहे हजारों बेनाम विचाराधीन कैदी भी खबर हैं। चुनिंदा मामलों पर आक्रोश और बाकी पर मौन न्याय प्रणाली पर जनता के भरोसे को कमजोर करता है।
अत: यह मामला केवल एक व्यक्ति को मिली राहत तक सीमित नहीं है। यह हमारी जेलों, अदालतों, पुलिस, सरकार और मीडिया के समक्ष एक आईना है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘उसे जमानत क्यों मिली?’, बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि ‘क्या जमानत और न्याय पाने का रास्ता हर भारतीय के लिए वास्तव में बराबर है?’
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

 

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