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उत्तर की बात : निषाद पार्टी के बदलते तेवर और २०२७ की दस्तक

-रोहित माहेश्वरी लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद पार्टी के बदलते तेवर और समाजवादी पार्टी (सपा) के शीर्ष नेताओं से बढ़ती नजदीकियां राज्य में एक बड़े राजनीतिक बदलाव का इशारा कर रही हैं। कभी भाजपा की नीतियों की ढाल बनने वाले क्षेत्रीय दल अब सपा के `पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित दिख रहे हैं। निषाद पार्टी के प्रमुख नेताओं का सपा की ओर झुकाव यह साफ करता है कि २०२४ के आम चुनाव में मिली बड़ी सफलता के बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा अब राज्य की राजनीति में मुख्य धुरी बन चुकी है। एनडीए के सहयोगी दलों के इन बदलते सुरों से यह स्पष्ट है कि वे सत्ता पक्ष के भीतर अपनी उपेक्षा से असहज हैं और २०२७ के विधानसभा चुनाव से पहले अपने लिए एक मजबूत और सुरक्षित सियासी ठिकाना तलाश रहे हैं। निषाद समाज और अन्य पिछड़े वर्गों के हक की लड़ाई में सपा आज एक विश्वसनीय और सबसे बड़े विकल्प के रूप में उभर रही है।
अखिलेश का चुनावी रथ तैयार
विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ‘समाजवादी पीडीए यात्रा’ से माहौल बनाएंगे। इसके लिए तैयार किया गया प्रचार ‘रथ’ बुधवार को पार्टी मुख्यालय पहुंच गया है। इस पर समाजवादी पीडीए यात्रा लिखा गया है।
फ़्रंट विंडशील्ड पर डा. बीआर आंबेडकर सहित १८ महापुरुषों की तस्वीर लगाई गई हैं। संभावना जताई जा रही है कि सपा प्रमुख अगले माह अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। यह ‘रथ’ विशेष सुविधाओं से लैस एक लग्जरी बस है, जिसमें सुख-सुविधाओं और सुरक्षा मानकों के साथ लिफ्ट और जनसंबोधन प्रणाली (पीए सिस्टम) भी है। लाल रंग के इस रथ पर ‘सामाजिक न्याय का परचम लहराएगा, पीडीए ही परिवर्तन लाएगा’ नारा लिखा गया है।

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