संजय राऊत
`भाजपा के विधायक पराग शाह एक दिन भिखारी के लिबास में घूमे। गरीबों की जिंदगी को समझने की कोशिश उन्होंने की। प्रधानमंत्री मोदी भी ‘फकीर’ होने का दावा करते हैं। असलियत में इन सबकी जिंदगी बड़े ठाठ-बाट वाली है। समाज में गरीबों को कौन पूछता है? यहां तो बस दिखावे की अहमियत है।’
महाराष्ट्र विधानसभा के एक बेहद अमीर विधायक पराग शाह अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक दिन भिखारी के लिबास में घूमे, जिसकी चर्चा हर तरफ हुई। जैन धर्म को माननेवाले शाह को उनके गुरु ने हुक्म दिया, ‘‘जनता के दुख-दर्द क्या हैं, जरा भेस बदलकर घूमिए और समझिए। आप सत्ता में हैं, अमीर हैं, इसलिए लोग आपको पहचानते हैं और इज्जत मान-सम्मान देते हैं। आप एक दिन भिखारी के लिबास में घूमिए, ताकि आपका यह अहंकार टूट सके।’’ विधायक पराग शाह ने गुरु के हुक्म की तामील की और एक दिन भिखारी की जिंदगी गुजारकर वापस अपनी वही आलीशान जिंदगी में लौट आए। मगर कुछ घंटों के लिए उन्होंने भिखारी की जिंदगी जीने की कोशिश की और समाज के असली दुख को महसूस किया। पराग शाह की जायदाद पांच हजार करोड़ की है। विधानसभा की उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करते वक्त शाह ने ३,३८३ करोड़ की जायदाद का सरकारी तौर पर एलान किया था। उन्हें और उनके घर वालों को किसी चीज की कमी नहीं है। तमाम सुख-सुविधाएं हाथ जोड़कर खड़ी हैं। फिर भी जैन मुनि के हुक्म पर वे एक दिन के लिए भिखारी बने। लेकिन क्या पराग शाह के एक दिन के लिए भिखारी बनने से भारत के भिखारियों की जिंदगी में कोई फर्क पड़ेगा? यह एक सोच-विचार का मुद्दा है।
अमीरों के चोंचले
भिखारी बनकर एक-आध दिन जीने की कोशिश कई अमीरों ने की है। भगवान बुद्ध या भगवान महावीर तो भरा-पूरा राज-पाट छोड़कर फकीर बने थे। जिसने अमीरी का मजा चखा, ऐश-ओ-आराम भोगा और फिर उसे हमेशा के लिए छोड़ दिया, उनके इस त्याग और फकीरी में एक अलग ही चमक होती है। पैदाइशी भिखारी और हुकूमत का त्याग करके जीने वाले फकीर में बड़ा फर्क होता है। राजाओं, महाराजाओं, वजीरों, मुख्यमंत्रियों और सेठ-साहूकारों के दरबार में भिखारियों को प्रवेश नहीं मिलता, फिर चाहे वह भिखारी कितना ही होशियार या विद्वान क्यों न हो। इसका तजुर्बा मिर्जा गालिब को भी हुआ था। बादशाह बहादुर शाह जफर दावतों की मेजबानी के लिए मशहूर शहंशाह थे। उनका दरबार मसनदों से ज्यादा दावतों के लिए जाना जाता था। एक दावत का निमंत्रण बादशाह ने गालिब को भी भेजा। गालिब मुफलिस थे, गरीब थे। उनके तन पर हमेशा पुराने और पैबंद लगे कपड़े होते थे, फटी हुई जूतियां और टोपी का रंग उड़ा हुआ, जिससे पसीने की बदबू आती थी। बादशाह का बुलावा मिलते ही गालिब खुश हो गए। यह खुशखबरी उन्होंने अपने दोस्तों को सुनाई। दोस्तों ने कहा, ‘गालिब, दरबार की दावत में जाने की बेवकूफी मत करो। तुम्हारी जिल्लत होगी। तुम्हारे कपड़े और जूते देखकर महल का दरबान तुम्हें भगा देगा…’
‘‘मैं शायर हूं…’’ गालिब बोले।
‘अरे भाई, कैसा शायर और कैसा लेखक! वहां शायरी और अदब को पहचानने वाली नजर नहीं है। वहां तो सिर्फ कपड़ों से इंसान की पहचान होती है,’ दोस्तों ने समझाया।
लेकिन गालिब अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘उन्होंने मुझे शायर मानकर बुलाया है। मेरे कपड़े अच्छे नहीं हैं तो क्या हुआ? मैं तो जाऊंगा ही…’ और गालिब अपने उन्हीं पुराने, फटे-पुराने लिबास में दावत में पहुंच गए।
कई अमीर-उमरा दावत के लिए आ रहे थे। दरवाजे पर खड़े दरबान सबको झुक-झुककर सलाम कर रहे थे। गालिब जैसे ही अंदर जाने लगे, दरबान ने उन्हें पकड़कर बाहर ढकेल दिया, ‘ऐ भिखारी! यह शाही महल है, अंदर कैसे घुसा आ रहा है?’ गालिब ने कहा, ‘मैं क्यों न आऊं? मुझे आज की दावत का बुलावा मिला है। यह देखो मेरा दावतनामा…’ और उन्होंने जेब से निमंत्रण पत्र निकालकर दिखाया। दरबान मजाक उड़ाते हुए हंसा और बोला, ‘बादशाह भिखारियों को न्योता नहीं देते। यह निमंत्रण पत्र तुमने किसी का चुराया है। यहां से दफा हो जाओ, वरना चोरी के जुर्म में जेल भिजवा दूंगा। भिखारी खुद को कब से बादशाह समझने लगे?’
गालिब दुखी होकर लौट आए। तब तक दोस्तों ने उधार मांगकर अच्छे कपड़े, कोट, जूते, छतरी और अत्तर वगैरह का इंतजाम कर रखा था। वे सब पहनकर गालिब दोबारा दरबार पहुंचे। वही दरबान झुककर बोला, ‘आइए-आइए, हुजूर आइए! हम आपका इस्तकबाल करते हैं।’ उसने गालिब का दावतनामा तक नहीं देखा और उन्हें सीधे बादशाह के करीब ले जाकर बिठा दिया। खाना शुरू हुआ, शराब भी दौर में थी। गालिब ने एक अजीब हरकत शुरू कर दी। वे प्लेट से कबाब, रोटी, बिरयानी का निवाला उठाते और अपने नक्शीदार कोट को खिलाते हुए कहते, ‘खाओ-खाओ… मेरे खूबसूरत कोट खाओ… खाओ… मेरी खूबसूरत जूतियों खाओ… सच तो यह है कि बादशाह की दावत के लिए तुम आए हो, मैं नहीं।’
बादशाह ने यह माजरा देखा तो उन्हें ताज्जुब हुआ, ‘गालिब, यह आप क्या कर रहे हैं?’ गालिब ने जवाब दिया, ‘बादशाह हुजूर! पहली बार जब मैं आया, तो मुझे भिखारी समझकर बाहर फेंक दिया गया, अंदर आने नहीं दिया। दूसरी बार जब मेरे जिस्म पर यह कीमती कपड़े और टोपी आई, तो सलाम और इज्जत मिली। इसलिए यह खाना और यह इज्जत इन कपड़ों और दिखावे को ही मिलनी चाहिए। मैं आया था तो दुत्कार दिया गया, मेरे कपड़े आए तो अंदर आने दिया गया।’
पराग शाह के किस्से में भी गालिब ही छुपा है। दुनिया इंसान को नहीं पहचानती, कपड़ों, ओहदे और पैसे को पहचानती है। पराग शाह को भी उस दिन किसी ने नहीं पहचाना। उनकी अपनी इमारत के चौकीदार ने भी उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। कुल मिलाकर उनका मेक-अप बढ़िया था।
ऐसा भी एक फकीर…
प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं, ‘मैं फकीर हूं।’ लेकिन वे फकीरों जैसी जिंदगी नहीं जीते। ८५ करोड़ लोगों को वे दस किलो मुफ्त अनाज देते हैं और खुद दस-दस लाख के कपड़े पहनकर इतराते हैं। उनके बैंक खाते में दस हजार करोड़ (निजी पीएम केयर्स फंड) जमा हैं। मोदी को गुरूर है। यह गुरूर फकीरी का है, अमीरी का है या सत्ता का, यह शायद उन्हें भी समझ नहीं आ रहा। मोदी की सियासत ने मुल्क में नफरत का जहर किस तरह घोल दिया है, यह उन्हें भी एक बार भेस बदलकर देखना चाहिए। भेस बदलकर प्रजा का हाल जाननेवाला राजा ही गरीबों का हमदर्द होता है। १६वीं सदी में स्कॉटलैंड का राजा जेम्स (पांचवां), जो ‘गुडमैन ऑफ बॉलेंगेइच’ के नाम से एक आम इंसान और कभी-कभी भिखारी बनकर अपनी रिआया में घूमता था। लोगों की परेशानियां और दुख-दर्द समझने के लिए वह फिरता था। उसे ‘गरीबों का राजा’ (पुअर मैन्स किंग) भी कहा जाता था। खलीफा हारून-अल-रशीद बगदाद की सड़कों पर आम इंसान या व्यापारी बनकर घूमा करते थे। कभी वे सड़क किनारे भिखारियों के झुंड में भिखारी बनकर सो जाते थे। राजा हरिश्चंद्र ने अपना सारा राज्य दान कर दिया और भिखारी की तरह जिए। फिल्मों और दूसरे कारोबार के कई बड़े नाम ‘राजा से रंक’ बन गए। आलीशान बंगले, गाड़ियां सब खत्म हो गर्इं और वे किसी चाल या झोपड़ी में रहने पर मजबूर हो गए। ऐसी कई मिसालें हमारे आस-पास देखने को मिलती हैं। कई लोग मुंबई के फुटपाथ पर भिखारी की तरह जिए और आगे चलकर उन्होंने अमीरी की बुलंदियों को छुआ। बुद्ध और महावीर ने ‘सर्वस्व’ त्याग दिया और वे दोबारा उस मायाजाल में नहीं गए। एक ज्ञानी राजा हमेशा अपनी प्रजा की फिक्र करता था, मगर उसे चिंता सताती थी कि ‘क्या मेरे बाद राजकुमार भी ऐसा सोचेगा?’ एक दिन उसने राजकुमार से कहा, ‘प्रजा के बीच जाओ। हो सके तो इस राज्य से बाहर जाकर भीख मांगो और यह भूल जाओ कि तुम यहां के राजकुमार हो।’ लड़का बात मानता है और सचमुच भिखारी बनकर जिंदगी बिताने लगता है। एक दिन राजा उसे वापस बुलाता है और कहता है, ‘पहले तुम राजकुमार थे, अब भिखारी बने। यह दोनों पहचान तुम्हें दूसरों ने दी हैं। पूरी दुनिया इन्हीं दो छोरों के बीच हवा में लटक रही है। जब तुम इन दोनों पहचानों से परे चले जाओगे और तुम्हें इसका भरोसा हो जाएगा, तभी तुम्हारा अहंकार खत्म होगा और तुम्हें सच्चा ज्ञान हासिल होगा।’ कुछ घंटों के लिए भेस बदलकर भिखारी बनना एक छोटा-सा नाटक हो सकता है, मगर वह त्याग नहीं है। त्याग का मतलब सिर्फ कपड़े बदलना नहीं होता। बुद्ध और महावीर की तरह अपनी पहचान को पूरी तरह मिटा देना ही सच्चा त्याग है।
गालिब के एक शेर के साथ यह बात खत्म करता हूं। गालिब कहते हैं,
हुआ है शाह का मुसाहिब,
फिरे है इतराता…
वरना शहर में ‘गालिब’ की
आबरू क्या है…
बादशाह की मेहरबानी है, बादशाह पहचान रखता है, इसलिए जरा ऐंठ में घूमता है। वरना इस शहर में गालिब की इज्जत ही क्या है?
