-उमा सिंह
अगर आप जिंदा हैं, आपकी सांसें चल रही हैं, आप अपने पैरों पर चल-फिर रहे हैं, तो यह मत समझिए कि सरकारी रिकॉर्ड में भी आप जिंदा ही होंगे। हो सकता है कि सरकारी फाइलों में आपकी ‘मौत’ हो चुकी हो। चौंकिए मत, ऐसा सच में हो सकता है, क्योंकि इस सिस्टम में जिंदा होने के लिए सिर्फ सांस लेना पर्याप्त नहीं, उसके लिए आपके पास जिंदा होने के कुछ कागजात भी होने चाहिए। फरीदाबाद से सामने आया एक मामला सरकारी व्यवस्था की इसी अजीब तस्वीर को सामने रखता है। यहां ८० साल के सुरजन सिंह खुद को ‘जिंदा’ साबित करने के लिए करीब तीन महीने से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। सुरजन सिंह बिल्कुल जिंदा हैं। सांस ले रहे हैं, चल-फिर रहे हैं और अपनी परेशानी भी खुद बता रहे हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड ने उन्हें करीब डेढ़ साल पहले ही ‘मृत’ घोषित कर दिया। रिकॉर्ड में मौत हुई तो पेंशन भी बंद हो गई। अब विडंबना तो देखिए, बुजुर्ग सामने खड़े हैं और कह रहे हैं कि मैं जिंदा हूं, लेकिन सिस्टम को शायद उनकी सांसों पर भरोसा नहीं। उसे तो बस कागज चाहिए, प्रमाण चाहिए, रिकॉर्ड चाहिए। गलती किसकी थी? रिकॉर्ड बनाने वाले सिस्टम की, लेकिन भुगत कौन रहा है, ८० साल का वह बुजुर्ग, जिसे अब अपनी ही जिंदगी का सबूत लेकर दफ्तर-दफ्तर घूमना पड़ रहा है। मानो जिंदा रहना ही उनकी गलती हो। यह सिर्फ सुरजन सिंह की परेशानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जहां गलती सिस्टम करता है, लेकिन उसे सुधारने का बोझ नागरिक के कंधे पर डाल दिया जाता है। एक डेटा एंट्री की गलती पेंशन रोक सकती है। सरकारी कागजों में सुरजन सिंह की जिंदगी डेढ़ साल पहले खत्म हो गई, लेकिन असली जिंदगी में उनकी परेशानी उसी दिन से शुरू हो गई। सांसें चल रही हैं साहब, अब कागज पर भी जिंदा करवा ही दीजिए…सब गजबे है जी..!
