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कुर्सियां खाली, इंसाफ अटका ६१ लाख मुकदमों का पहाड़!

-महाराष्ट्र में ५९ प्रतिशत न्यायिक पद रिक्त – प्रत्येक कार्यरत अधिकारी पर औसतन करीब २,८८३ लंबित मामलों का बोझ

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की अधीनस्थ अदालतों में इंसाफ की रफ्तार धीमी होने की भयावह वजह सरकारी हलफनामे से सामने आई है। राज्य में स्वीकृत ५,१९५ न्यायिक पदों में केवल २,११६ पद भरे हैं। यानी करीब ५९ प्रतिशत कुर्सियां खाली हैं और अदालतें स्वीकृत क्षमता के मात्र ४०.७३ प्रतिशत न्यायिक अधिकारियों के सहारे चल रही हैं।
दूसरी तरफ जिला, सत्र और मजिस्ट्रेट अदालतों में ६१ लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सीधा औसत निकालें तो प्रत्येक कार्यरत न्यायिक अधिकारी पर करीब २,८८३ लंबित मामलों का भार बैठता है। हालांकि, अदालत और मुकदमे की श्रेणी के अनुसार वास्तविक कार्यभार अलग-अलग होगा।
मुंबई हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी ने स्थिति को गंभीर बताते हुए नियुक्तियों के लिए लोकसेवा आयोग से समन्वय हेतु समिति गठित की है। उन्होंने करीब ३,००० और पद बनाने के प्रस्ताव पर सवाल उठाया—जब मौजूदा पद ही नहीं भर रहे तो नई अदालतों के लिए भवन, कर्मचारी और दूसरी सुविधाएं कहां से आएंगी?
इस कमी का असर केवल दीवानी विवादों पर नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों तथा फास्ट ट्रैक मामलों की सुनवाई पर भी पड़ रहा है। मामला इन्हीं अपराधों के लिए पर्याप्त फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करने की मांग वाली जनहित याचिका में सामने आया।
‘तारीख पर तारीख’ से जनता बेहाल!
रोहित पवार ने सरकार पर उठाए सवाल
महाराष्ट्र की न्याय व्यवस्था में बड़ी संख्या में पद रिक्त होने और लाखों मुकदमे लंबित रहने को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने सरकार पर निशाना साधा है। राज्य में स्वीकृत ५,१९५ न्यायिक पदों में केवल २,११६ पद कार्यरत होने और ६१ लाख से अधिक मामले लंबित होने के आंकड़े सामने आए हैं। रोहित पवार ने कहा कि न्याय पाने के लिए आम नागरिक के पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन जब अदालतों में न्यायिक पद ही खाली हों और मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ता जाए, तो समय पर न्याय मिलना चुनौती बन जाता है। उन्होंने कहा कि ‘तारीख पर तारीख’ की स्थिति नागरिकों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर कर रही है।

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