मुख्यपृष्ठनए समाचारआस्था अपनी जगह, आधी रात का शोर क्यों?..हाई कोर्ट सख्त!

आस्था अपनी जगह, आधी रात का शोर क्यों?..हाई कोर्ट सख्त!

-गणेशोत्सव के तेज डीजे, पटाखों और लेजर लाइट पर स्वत: संज्ञान
-अदालत ने पूछा, `रात १० बजे का नियम तो आधी रात तक अनुमति क्यों?’

सामना संवाददाता / मुंबई

गणेशोत्सव के नाम पर देर रात तक बजते डीजे, सड़कों पर फोड़े जाते पटाखे और तेज लेजर लाइट अब मुंबई हाई कोर्ट की जांच के दायरे में हैं। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने ध्वनि एवं वायु प्रदूषण पर स्वत: संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की है।
मुंबई हाई कोर्ट ने कहा कि उत्सव और जुलूस आयोजित करने पर आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन कुछ लोगों की मनमानी के कारण हजारों निर्दोष नागरिकों को परेशान नहीं किया जा सकता। मौजूदा नियमों का जमीन पर पालन नहीं होने से बच्चे, बुजुर्ग, मरीज और विद्यार्थी देर रात तक शोर सहने को मजबूर हैं।
पीठ ने सवाल किया कि सामान्यत: लाउडस्पीकर की अनुमति रात १० बजे तक है तो जुलूसों में डीजे को आधी रात तक बजाने की छूट किस तर्क पर दी जाती है? अदालत ने जहरीला धुआं और अत्यधिक शोर फैलाने वाले पटाखों तथा सार्वजनिक सड़कों पर उनसे होने वाली दुर्घटनाओं पर भी गंभीर चिंता जताई।
क्षेत्र दिन की सीमा रात की सीमा
औद्योगिक ७५डीबी ७०डीबी
व्यावसायिक ६५ डीबी ५५ डीबी
आवासीय ५५ डीबी ४५ डीबी
शांत क्षेत्र ५०डीबी ४० डीबी
रात्रि अवधि: रात १० से सुबह ६ बजे तक। सार्वजनिक स्थल पर लाउडस्पीकर का शोर संबंधित क्षेत्र की निर्धारित सीमा से १०डीबी अधिक या ७५ डीबी, दोनों में जो कम हो, उससे ज्यादा नहीं होना चाहिए।
` जिंदगी पर भारी पड़ने वाला जश्न नहीं चाहिए’
न्यायालय ने कहा कि ऐसा उत्सव नहीं होना चाहिए, जिसका जश्न किसी की जिंदगी पर भारी पड़ जाए। पटाखे फोड़ते समय कई लोग घायल होते हैं। दही हंडी में ऊंचाई सहित सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों पर न्यायालय पहले ही उचित निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद छोटे बच्चों को भी गोविंदा के रूप में शामिल किया जाता है। न्यायालय ने कहा कि दही हंडी के दौरान कई गोविंदाओं की जान जा चुकी है और अनेक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके बावजूद न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं किया जाता।

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