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पुस्तक समीक्षा : झोपड़पट्टी के साथ कारपोरेट दुनिया का यथार्थ सामने लाता है “बिल्लाबाँग”

राजेश विक्रांत

मुंबई महानगर के कल्याण के पास विट्ठलवाड़ी इलाके में पले-बढ़े अक्षय दया मोहिते आज की पीढ़ी के एक नए, होनहार और उतने ही बोल्ड लेखक हैं! उनके लेखन की मुख्य विशेषता एक अलग तरह की भाषा, शैली और कहानी कहने का तरीका भी है। यशवंत राव चव्हाण सेंटर की शरद पवार इंस्पायर फेलोशिप प्राप्त उनके उपन्यास
बिल्लाबाँग के ज़रिए, हमें एक झोपड़पट्टी इलाके आनंद नगर की संघर्ष व भागदौड़ भरी से दुनिया, जिसमें गरीबी, अभाव, दरिद्रता, व्यसन, लड़ाई- झगड़ा, विवाद, जातीय दंश, छुआछूत आदि का बोलबाला है, और एक कार्पोरेट कंपनी रेशीमगाठी मेट्रोमोनियल के कॉल सेंटर जीवन की चमक-दमक वाली दुनिया का एक अनोखा मेल देखने को मिलता है। लेखक ने मेट्रीमोनियल कंपनी की वर्चुअल दुनिया की मृगतृष्णा, उसमें गुमनाम लोगों के दिल को छू लेने वाले सुख-दुख और उनके ज़िंदा रहने के संघर्ष को बड़ी मज़बूती से पेश किया है।

बिल्लाबाँग तीन मामलों में बेहद समृद्धि कृति है। पहली बात तो यह है कि मुंबई पर तो खूब लिखा गया है, प्रचुर मात्रा में मुंबई के जन जीवन पर आधारित कहानियां व उपन्यास लिखे गए हैं लेकिन कल्याण- विट्ठलवाड़ी जैसे इलाके की झोपड़पट्टी को केंद्र में रखकर मराठी में यह पहला उपन्यास लिखा गया है। दूसरी बात यह है कि आनंद नगर की जो बोलचाल की भाषा है, वह मराठी की भाषाई समृद्धि को बढ़ाती है; जो ‘स्लैंग’ नहीं बल्कि बातचीत का एक जीता-जागता तरीका है। यह भाषा बहुत सीधी, आज के ज़माने की, रोज़मर्रा की ज़िंदगी वाली और सिनेमाई मानी जाती है। इसके अलावा इसमें कॉल सेंटर के निमित्त महाराष्ट्र की तकरीबन 8-9 मराठी बोलियों में भी संवाद हैं। तीसरा तथ्य यह है कि इस उपन्यास में तृतीयपंथियों की दुनिया पर भी प्रकाश डाला गया है।
बिल्लाबाँग के पात्रों में झवाडा चाचा, चोमू, मीना पोटे, चार्ली, डब्ल्यू, हंसा, सोमनाथ, डब्ल्यू का पिता, मुकेश, नन्दा व लवंगी प्रमुख हैं। उपन्यास का नायक डैनी कंडार जेन जी पीढ़ी का बुद्धिमान युवक है। अनाथ डैनी अपने मामा के यहां छोटे से बड़ा होता है। डैनी आनंद नगर झोपड़पट्टी में रहता है। इसके सामने फ्लाईओवर है तो बगल में रेलवे लाइन व किलेबंदी सरीखे सुरक्षा वाले आलीशान टावर्स। बुद्धिमान डैनी रोजाना झोपड़पट्टी के संघर्ष से दो चार होता है, जिसमें अभाव है, छुआछूत का दंश है, लड़ाई झगड़ा विवाद है, धर्मांधता का जहर है, कई तरह के व्यसन हैं, कभी कभार होने वाली आत्महत्या भी है। डैनी दरिद्रता के दलदल से बाहर आने के लिए संघर्ष करता है, वह अपनी जाति छिपाकर मैट्रिमोनियल कंपनी के कॉल सेंटर में नौकरी पा जाता है।
वह बाहर के चमकते मॉल कल्चर और ग्लैमरस नौकरी में झोपड़पट्टी की चीज़ों की कमी ढूंढने की कोशिश करता है। लेकिन, शादी का लालच देने वाली और झूठे सपनों का पैकेज बेचने वाली नौकरी में भी वह रुक नहीं पाता। क्योंकि रेशीमगाठी कंपनी विवाह करवाने का लालच देकर समाज का आर्थिक शोषण करती है, लोगों को फंसाकर वह उन्हें बेवकूफ बनाती है।
बेफिक्री से जीने वाले डैनी को इस सिस्टम का झूठा, बेरहम और गलत सिस्टम पसंद नहीं आता। डैनी बाबा गैंग का हिस्सा बन जाता है और वह नशे की दुनिया में ऐसा धंसता है कि उससे बाहर नहीं निकल पाता। ये विसंगति देखिए कि बाबा गैंग नामक ये ग्रुप बच्चों को शैक्षणिक सहायता करने के साथ उन्हें नशे की दुनिया छोड़कर सही जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित भी करता है।

डैनी व तृतीयपंथी
लवंगी के बीच का रिश्ता व संवाद पाठकों को नया दर्शन देते हैं। लवंगी
का प्यार डैनी को अच्छा लगता है, लेकिन वह भी भाग जाता है, और एक बार फिर डैनी अकेला रह जाता है।

व्यवस्था से प्रताड़ित डैनी और उसके आसपास का माहौल एकदम यथार्थ है। नशे की लत में डूबे लोगों का वजूद, इंसान के तौर पर उनकी ऊर्जा, व्यवस्था के बनाए नियमों से बंधे इन लोगों को कौन समझ सकता है? असल में, उन्हें समझने की दूर दूर तक कोई उम्मीद ही नहीं है। रेलवे की चहल- पहल इन लोगों की ज़िंदगी को ज़िंदा रखती है।
उपन्यास कई तरह के नशे, लड़ाई-झगड़े, हत्या, आत्महत्या, ज़िंदगी में कई तरह के दुख, अभाव और उनसे गुज़रने की जद्दोजहद को बहुत अच्छे से बताता है।
कुल मिलाकर, ललित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 490 पृष्ठों का बिल्लाबाँग एक ऐसा उपन्यास है जो पुरानी परंपराओं को तोड़कर आज के समाज की असलियत को जीर्ण-शीर्ण परंपरा में पेश करता है। नॉवेल को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे कोई अच्छी क्वालिटी की ‘वेब सीरीज’ देख रहे हों।
अक्षय दया मोहिते ने आज की सेमी-अर्बन ज़िंदगी, बहुजन और अभिजन दोनों की दुनिया और वहां के लोगों को वास्तविक रूप में चित्रित किया है।

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