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एआई या भ्रम का जाल?

-धीरज फूलमती सिंह
हाल-फिलहाल में एआई का काफी हौआ खड़ा किया जा रहा है लेकिन इंसान ने उसके साथ भी छेड़खानी कर दी। अभी हाल में स्वीडन के शोधकर्ताओं ने एक काल्पनिक नेत्र रोग बनाया, जिसका नाम रखा ‘बिक्सोनिमेनिया’ दावा किया गया कि यह बीमारी मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी के अत्यधिक संपर्क से होती है और आंखों के आसपास त्वचा में बदलाव लाती है। लेकिन सच तो यह था कि ऐसी कोई बीमारी कभी अस्तित्व में थी ही नहीं। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इस काल्पनिक बीमारी पर दो नकली शोध-पत्र भी तैयार किए। इनमें कई ऐसे संकेत जानबूझकर छोड़े गए थे जिनसे कोई भी सतर्क पाठक समझ सकता था कि यह मजाक या प्रयोग है। उदाहरण के लिए, लेखक का नाम लिजविकी ऐसा रखा गया जिसका अर्थ झूठा व्यक्ति निकलता था। संदर्भ सूची में स्टारफ्लिट एकेडमी और यूएसएस संस्थान जैसे विज्ञान-कथा से जुड़े नाम भी शामिल कर दिए गए थे। यहां तक कि सामग्री में ऐसे संकेत भी थे, जो बताते थे कि यह वास्तविक चिकित्सा शोध नहीं है। अनुसंधान के परिणाम चौंकाने वाले थे।
चैट जीपीटी,जैमिनी, माइक्रोसॉफ्ट कॉपीलोट और कुछ अन्य एआई प्रणालियों ने इस काल्पनिक बीमारी को वास्तविक मान लिया। उन्होंने न केवल इसके लक्षण बताए बल्कि कारण, उपचार और बचाव के उपाय भी आत्मविश्वास के साथ समझाने लगे। यही नहीं, प्रयोग का एक और अप्रत्याशित पहलू सामने आया। कुछ शोधकर्ता भी इन नकली शोध-पत्रों को देखकर भ्रमित हो गए और बाद में इन्हें वास्तविक मानकर उद्धृत कर बैठे। यानी केवल एआई ही नहीं, इंसान भी इस जाल में फंस गए।
यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यानी एआई मतिभ्रम की ओर संकेत करती है। इसकी गलत जानकारी भी इतनी विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत करता है कि उपयोगकर्ता उसे सच मान लेते हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति किसी बीमारी, दवा या उपचार के बारे में केवल एआई पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता हैं। जान का जोखिम हो सकता है।
यदि एआई किसी काल्पनिक बीमारी को वास्तविक मान सकता है, तो वह किसी झूठे अदालती फैसले, अस्तित्वहीन कानूनी प्रावधान या मनगढ़ंत वित्तीय नियम को भी उतने ही आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकता है। ऐसे में एआई की गलत सलाह किसी व्यक्ति या संस्था को भारी आर्थिक और कानूनी नुकसान पहुंचा सकती है।

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