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राजस्थान का रण!..एक को मरने के बाद तबादला, दूसरे को घंटेभर की अफसरी! एक को मरने के बाद तबा

राजस्थान में फाइलें समय पर नहीं चलतीं, लेकिन चलती ऐसी हैं कि जीवित को प्रतीक्षा और मृतक को तैनाती दे देती हैं। बाड़मेर के एएसआई अनोपाराम का १ जुलाई को निधन हो गया। इसके बाद जारी तबादला सूची में उनका स्थानांतरण गृह जिले बालोतरा कर दिया गया। जिंदगीभर कर्मचारी घर के पास आने की प्रतीक्षा करता रहा; विभाग ने मृत्यु के बाद कहा, लीजिए, आपकी मांग स्वीकार हुई!
दूसरी ओर झुंझुनूं में मनोज कुमार को सेवानिवृत्ति के दिन ६० मिनट के लिए जिला प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी बनाया गया। उन्होंने कुर्सी संभाली, माला पहनी, तस्वीर खिंचवाई और रिटायर हो गए। सरकारी पदोन्नति का यह ‘एक घंटे वाला पैक’ अद्भुत है! न बैठक का तनाव, न भ्रष्टाचार का अवसर, न जनता की शिकायत सुनने का खतरा। केवल पदनाम का स्वाद चखिए और विदाई समारोह में पहुंच जाइए!
दोनों घटनाएं बताती हैं कि व्यवस्था में समय का दर्शन है। यहां आदेश कर्मचारी की जरूरत देखकर नहीं, फाइल की नींद खुलने पर निकलता है। अनोपाराम के परिजन शायद सोच रहे होंगे, काश यही आदेश कुछ दिन पहले आ जाता। मनोज सोच रहे होंगे, काश घड़ी थोड़ी धीरे चलती! पर भाई सरकार को कुछ और ही मंजूर है… राजस्थान में अफसरी और तबादले का नया नियम है, जीते-जी इंतजार कीजिए; भाग्य अच्छा हुआ तो सेवानिवृत्ति से घंटेभर पहले कुर्सी और मृत्यु के बाद घर वापसी मिल जाएगी!
आयोग ने मॉक टेस्ट पकड़ा, छात्र ने एआई से खुद को अगवा कराया!
राजस्थान में परीक्षाएं अब ज्ञान की नहीं, कल्पनाशक्ति की प्रतियोगिता बन गई हैं। एसआई पुनर्परीक्षा का कथित प्रश्नपत्र और ओएमआर शीट दिखाने वाला वीडियो प्रसारित हुआ तो राजस्थान लोक सेवा आयोग ने प्राथमिकी दर्ज करा दी। पुलिस जांच में वीडियो असली परीक्षा का नहीं, अगले दिन केंद्र पर आयोजित मॉक टेस्ट का निकला। अफवाह तेज दौड़ी कि आयोग सत्यापन के जूते पहनता, उससे पहले थाने पहुंच गई!
उधर कोटा में नीट के दबाव से बचने के लिए एक छात्र ने अपने अपहरण की कहानी रच दी। आरोप है कि उसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से फर्जी वीडियो बनाकर खुद को अगवा दिखाया। पढ़ाई में मन नहीं लगा, लेकिन पटकथा, निर्देशन, अभिनय और तकनीक, विषयों में प्रतिभा झोंक दी। अब शिक्षा व्यवस्था को पाठ्यक्रम बनाना चाहिए, प्रश्नपत्र पहचान विज्ञान, वायरल वीडियो सत्यापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से अपहरण निर्माण और अभिभावकों को घबराने से रोकने का प्रशिक्षण!
पहली घटना बताती है कि संस्थान बिना जांच के प्रतिक्रिया दें तो मॉक टेस्ट भी राष्ट्रीय संकट बन सकता है। दूसरी घटना चेताती है कि परीक्षा का दबाव बच्चों को खतरनाक नाटक रचने तक ले जा सकता है। ऐसे में किसी का भी दिमाग चकरा जाए… आयोग नकली पेपर को असली मान बैठा और छात्र ने नकली अपहरण को असली बनाने की कोशिश की! परीक्षा में कौन पास हुआ, अफवाह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या हमारी घबराई व्यवस्था?
आईजी छुट्टी पर लापता, सिपाही बाबा बनकर प्रकट!
राजस्थान पुलिस में अनुशासन ने रूप धारण कर लिया है। आईपीएस कालूराम रावत कथित तौर पर बुखार के कारण एक दिन की छुट्टी का संदेश भेजकर गए और साढ़े तीन महीने तक ड्यूटी पर नहीं लौटे। फोन बंद, तैनाती नहीं संभाली; मगर पदोन्नति और तबादला हो गया। सिपाही एक दिन बिना बताए गायब हो तो नोटिस और निलंबन! आईजी साहब गायब हों तो विभाग सोचता है, अधिकारी हैं, शायद गुप्त अभियान पर होंगे! दूसरी ओर राजस्थान सशस्त्र पुलिस के पूर्व कांस्टेबल श्रीराम मीणा पर २०११ की भर्ती परीक्षा में डमी अभ्यर्थी बैठाने का आरोप लगा। एसओजी ने मामला दर्ज किया तो पता चला कि कांस्टेबल अब ‘अघोरी बाबा’ बनकर फेसबुक पर ज्ञान बांट रहे हैं। वाह! भर्ती में परीक्षा मत दो, नौकरी में वर्दी पहनो और पोल खुलने से पहले वैराग्य धारण कर लो! राजस्थान पुलिस में पहचान का संकट है, जिसे कार्यालय में होना चाहिए, वह गायब है; जिसे परीक्षा में बैठना था, उसकी जगह कोई दूसरा बैठा; और जिसे कानून समझाना था, वह अध्यात्म समझा रहा है। दोनों मामलों में अंतिम निष्कर्ष जांच और विभागीय प्रक्रिया से निकलेगा। अब आप ही तय करिए… पुलिस अपराधियों को खोजे या अपने अफसर को? असली उम्मीदवार ढूंढे या फेसबुक वाले बाबा को? यहां खाकी कभी छुट्टी पर समाधि लगा रही है, कभी फर्जीवाड़े के बाद मोक्ष खोज रही है! दला, दूसरे को घंटेभर की अफसरी!

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