मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : दिल्ली में कुत्तों का भी चुनाव!

दिल्ली लाइव : दिल्ली में कुत्तों का भी चुनाव!

-अरुण कुमार गुप्ता

दिल्ली की राजनीति में चुनाव, वोट और वोट बैंक की चर्चा तो आम है, लेकिन राजधानी के वसंत विहार में इस बार लोकतंत्र का एक ऐसा ‘चार पैर वाला संस्करण’ सामने आया, जिसने लोगों को भी चौंका दिया। यहां इंसानों ने अपने पसंदीदा मोटे-ताजे कुत्ते के लिए बाकायदा वोट किया। यानी उम्मीदवार भौंकते रहे और मतदाता वोट डालते रहे! वसंत विहार में आयोजित इस अनोखे चुनाव में स्थानीय लोगों ने अपने पसंदीदा कुत्ते को चुनने के लिए मतदान किया। किसी की गोल-मटोल काया पसंद आई तो किसी की मासूम शक्ल और किसी की मोहल्ले में लोकप्रियता ने उसे ‘उम्मीदवार’ बना दिया। मजेदार बात यह रही कि इस चुनाव में न भाषणों का शोर था, न वादों की बौछार और न ही पोस्टर-बैनर की राजनीति। फिर भी वोट डालने वालों में उत्साह किसी असली चुनाव से कम नहीं था। राजधानी में इन दिनों असली राजनीतिक दल मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे माहौल में वसंत विहार का यह आयोजन दिल्ली की राजनीति का एक मजेदार आईना जरूर बन गया। यहां न कोई नेता था, न मंत्री और न विधायक। फिर भी चुनाव था, उम्मीदवार थे और वोट भी थे। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार उम्मीदवार चार पैरों पर दौड़ रहे थे और मतदाता दो पैरों पर।
पकौड़े से ई-रिक्शा तक!
कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पकौड़े बेचने को रोजगार का उदाहरण बताने पर शुरू हुई बहस अब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के ई-रिक्शा वाले बयान तक पहुंच गई है। पाठक ने ‘भारत टैक्सी’ कार्यक्रम में ड्राइवरों को नौकरी के पीछे भागने के बजाय अपना ई-रिक्शा या टैक्सी चलाकर कमाई करने की सलाह दी। बयान का संदर्भ स्वरोजगार को बढ़ावा देने का था, लेकिन इससे रोजगार की उस पुरानी बहस ने फिर सिर उठा लिया है, जिसमें युवा सरकार से नौकरी मांगता है और उसे अपना काम शुरू करने की सलाह दी जाती है। ई-रिक्शा चलाना या पकौड़े बेचना कोई छोटा काम नहीं है। मेहनत से कमाई करने वाले हर व्यक्ति के काम का सम्मान होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जिस युवा ने वर्षों पढ़ाई करके डिग्री हासिल की है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है और सरकारी नौकरी का इंतजार किया है, उसके लिए सरकार की रोजगार नीति क्या है? क्या स्वरोजगार को बढ़ावा देना नियमित और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का विकल्प बन सकता है? क्या हर स्नातक, इंजीनियर, शिक्षक या तकनीकी डिग्रीधारी युवा अपना रोजगार खरीदने की स्थिति में है? युवाओं को सिर्फ यह बताना आसान है कि ‘अपना काम शुरू करो’, लेकिन असली सवाल भर्ती और रोजगार के अवसरों का है। कितने रिक्त सरकारी पद भरे गए? कितने युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिला? निजी क्षेत्र में कितने गुणवत्तापूर्ण अवसर पैदा हुए? पकौड़े से ई-रिक्शा तक पहुंची रोजगार की यह बहस सरकार के सामने सीधा सवाल रखती है। युवा नौकरी मांग रहा है तो क्या उसे नौकरी के बजाय सिर्फ स्वरोजगार का रास्ता दिखाया जाएगा? युवाओं को काम चाहिए, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उनकी डिग्री, कौशल और वर्षों की मेहनत के अनुरूप काम मिलेगा? यही रोजगार नीति की असली कसौटी है।
पुरानी बसों का ‘भगवा मेकओवर’!
मध्य प्रदेश में २१ साल बाद सार्वजनिक बस सेवा की वापसी को मुख्यमंत्री मोहन यादव सरकार ने बड़े बदलाव के रूप में पेश किया। मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ३५१ बसों को हरी झंडी दिखाई। सरकार ने पहले वर्ष १,५०० और आगे १५ हजार बसों तक नेटवर्क पहुंचाने का लक्ष्य बताया। लेकिन उद्घाटन के अगले ही दिन बसों के रंग-रूप और उनकी वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, ३५१ बसों में १८० नई इलेक्ट्रिक बसें थीं, जबकि १७१ बसें पहले से ही विभिन्न शहरों में सिटी बस के रूप में चल रही थीं। यहां सवाल पुरानी बसों को चलाने पर नहीं है। यदि कोई पुरानी बस तकनीकी रूप से फिट है, उसकी वैध फिटनेस है और वह सुरक्षा मानकों को पूरा करती है तो उसका संचालन किया जा सकता है। सवाल है, क्या जनता को स्पष्ट रूप से बताया गया कि ३५१ में कितनी बसें नई हैं और कितनी पहले से चल रही हैं? रिपोर्टों के अनुसार, पहले लाल रंग में चल रही सिटी बसों को नई व्यवस्था के तहत एकरूपता देने के लिए नारंगी/भगवा रंग और रेडियम लगाया गया। यानी बस का संचालन नया हो सकता है, लेकिन बस स्वयं नई होना जरूरी नहीं। सरकार को बताना चाहिए कि १७१ मौजूदा बसों का निर्माण वर्ष क्या है? वे अब तक कितने किलोमीटर चल चुकी हैं? उनकी फिटनेस कब हुई? रंग-रोगन और मरम्मत पर कितना खर्च हुआ? क्या सभी बसों में सुरक्षा मानकों की दोबारा जांच हुई? कितनी बसें वास्तव में नई खरीदी गई हैं? क्योंकि बस पर नया रंग चढ़ने से उसका निर्माण वर्ष नहीं बदलता। लॉन्च के बाद कुछ बसों पर लगाए गए रेडियम स्ट्रिप के उखड़ने के वीडियो भी सामने आए। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी एक वीडियो साझा कर सरकार पर निशाना साधा।

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