सामना संवाददाता / वसई
विरार-अलिबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर की प्रस्तावित जमीन पर करीब दो हजार अवैध कमरे खड़े कर सरकारी मुआवजा हासिल करने की कथित कोशिश ने प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नायगांव पुलिस ने इस मामले में १० लोगों के खिलाफ महाराष्ट्र प्रादेशिक एवं नगर रचना अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।
पुलिस के अनुसार, निर्माण के लिए जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि इन कमरों में लोगों को बसाकर उन्हें परियोजना प्रभावित परिवारों के रूप में प्रस्तुत करने और भविष्य में सरकारी मुआवजा लेने की तैयारी थी।
मुआवजे के लिए बना डाले हजारों कमरे?
जांच में सामने आया है कि वर्ष २०२३-२४ के दौरान करीब १० गुणा १० फुट आकार के लगभग दो हजार अर्ध-पक्के कमरे बनाए गए। इससे पहले राजस्व विभाग करीब १,९०० अवैध निर्माणों को ध्वस्त कर चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने व्यापक स्तर पर निर्माण महीनों तक किसकी निगरानी में चलता रहा? स्थानीय प्रशासन और राजस्व विभाग को समय रहते इसकी भनक क्यों नहीं लगी? जमीन के दस्तावेजों की जांच निर्माण शुरू होते ही क्यों नहीं की गई? क्या इस पूरे खेल के पीछे केवल नामजद १० लोग थे या भूमाफिया, दलाल और अधिकारियों का कोई बड़ा नेटवर्क भी सक्रिय था?
कॉरिडोर नहीं बना, मुआवजे की तैयारी पहले!
विरार-अलिबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर का निर्माण लगभग मार्च २०२७ में शुरू होने की योजना है। इसके पहले ही प्रस्तावित मार्ग पर हजारों कमरे खड़े होना प्रशासनिक सतर्कता की पोल खोलता है। मामला दर्ज होना कार्रवाई की शुरुआत है। असली परीक्षा यह पता लगाने की होगी कि कथित फर्जी दस्तावेज किसने बनाए, निर्माण को संरक्षण किसने दिया और प्रस्तावित मुआवजे की जानकारी आरोपियों तक कैसे पहुंची। आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
