मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम : झूठी गवाही देना या गढ़ना अपराध है

कोर्ट-रूम : झूठी गवाही देना या गढ़ना अपराध है

-एड. कनई बिस्वास

धारा २२९, २३० और २३१

भारतीय न्याय संहिता, २०२३ में न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए झूठी गवाही और झूठे साक्ष्य तैयार करने को अत्यंत गंभीर अपराध माना गया है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य देता है या गढ़ता है, विशेष रूप से किसी निर्दोष व्यक्ति को गंभीर अपराध में दोषी ‘हरवाने के उद्देश्य से तो उसके लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। धारा २२९, २३० और २३१ न्यायालय को गुमराह करने वाले ऐसे अपराधों से संबंधित हैं।
केस स्टडी- १: ‘मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए दंड’ (धारा २२९)
एक दीवानी वाद में एक गवाह ने न्यायालय के समक्ष शपथ लेकर जानबूझकर झूठा बयान दिया। दूसरे पक्ष ने दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्रस्तुत किए, जिनसे स्पष्ट हो गया कि गवाह का बयान पूरी तरह असत्य था।
पैâसला- यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया या गढ़ा, तो उसके विरुद्ध धारा २२९ के तहत निर्धारित दंड दिया जाएगा। समझें: धारा २२९ का उद्देश्य न्यायालय और अन्य वैधानिक प्राधिकारियों के समक्ष सत्य को सुरक्षित रखना है। झूठी गवाही देना या झूठे साक्ष्य तैयार करना न्याय के साथ छल है।
केस स्टडी- २: ‘मृत्युदंड से दंडनीय अपराध में दोषसिद्धि कराने के उद्देश्य से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना’ (धारा २३०)
एक व्यक्ति ने अपने निजी दुश्मन को हत्या के मुकदमे में फंसाने के लिए झूठे प्रत्यक्षदर्शी तैयार किए और नकली साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत कराए। जांच में वैज्ञानिक परीक्षण और अन्य साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो गया कि पूरा घटनाक्रम झूठा रचा गया था।
पैâसला- यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने किसी व्यक्ति को मृत्युदंड से दंडनीय अपराध में दोषी ‘हरवाने के उद्देश्य से मिथ्या साक्ष्य दिया या गढ़ा तो उसके विरुद्ध धारा २३० के तहत अत्यंत कठोर कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २३० न्याय व्यवस्था में सबसे गंभीर प्रकार की झूठी गवाही से संबंधित है। किसी निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदंड जैसे गंभीर परिणाम तक पहुंचाने का प्रयास कानून की दृष्टि में अत्यंत जघन्य अपराध है।
केस स्टडी- ३: ‘आजीवन कारावास या कारावास से दंडनीय अपराध में दोषसिद्धि कराने के उद्देश्य से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना’ (धारा २३१)
एक व्यक्ति ने अपने व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी को गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने के लिए नकली दस्तावेज तैयार किए और झूठे गवाह खड़े किए। उसका उद्देश्य था कि प्रतिद्वंद्वी को आजीवन कारावास या लंबी अवधि के कारावास की सजा हो।
पैâसला- यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने किसी व्यक्ति को आजीवन कारावास या कारावास से दंडनीय अपराध में दोषी ‘हरवाने के उद्देश्य से मिथ्या साक्ष्य दिया या गढ़ा, तो उसके विरुद्ध धारा २३१ के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २३१ का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति झूठे साक्ष्यों के आधार पर गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी न ‘हराया जाए। न्यायालय में प्रस्तुत प्रत्येक साक्ष्य की सत्यता कानून की दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि न्यायालय का निर्णय सत्य और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। झूठी गवाही देना, मिथ्या साक्ष्य तैयार करना और किसी निर्दोष व्यक्ति को गंभीर अपराध में दोषी ‘हरवाने का प्रयास न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन है, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था पर आघात है। इसलिए ऐसे अपराधों के लिए भारतीय न्याय संहिता में अत्यंत कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।’
(अगले अंक में: धारा २३२, २३३ और २३४ – झूठी गवाही देने के लिए किसी व्यक्ति को धमकाना, झूठा होने की जानकारी होने के बावजूद साक्ष्य का उपयोग करना तथा झूठा प्रमाणपत्र जारी करना या उस पर हस्ताक्षर करने से संबंधित प्रावधानों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे।)

 

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