मुख्यपृष्ठखबरेंइस्लाम की बात : आंकड़ों की सियासत और सिकुड़ता सामाजिक ताना-बाना

इस्लाम की बात : आंकड़ों की सियासत और सिकुड़ता सामाजिक ताना-बाना

-सैयद सलमान 

आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाओं में नीतियां बनाने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के लिए आंकड़े सबसे प्रामाणिक आधार माने जाते हैं। लेकिन जब इन्हीं आंकड़ों को जुटाने की कवायद किसी एक विशेष समुदाय की घेराबंदी करने, उसे अलग-थलग करने और उसकी सामाजिक हैसियत को संदिग्ध बनाने का उपकरण बन जाए, तब सत्ता की नीयत पर स्वाभाविक रूप से गंभीर सवाल उठते हैं।
सुनियोजित साजिश!
हाल ही में गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकी समिति द्वारा राज्यों से नागरिकों की संपत्ति, वाहन खरीद, स्कूल नामांकन और मतदाता सूची जैसे विवरणों को धार्मिक आधार पर वर्गीकृत करके संकलित करने का जो निर्देश दिया गया है, उसने मुस्लिम समाज के भीतर गहरी मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल और असुरक्षा पैदा कर दी है। यह चिंता सिर्फ प्रशासनिक मुश्किलात की नहीं है, बल्कि उस सुनियोजित खाके की है, जो सदियों से चली आ रही साझी विरासत को खंडित कर हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एक-दूसरे के समक्ष अविश्वास के कटघरे में खड़ा करने की जमीन तैयार कर रही है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी व्यवस्था ने समाज के वंचित या पिछड़े तबके के उत्थान की सच्ची मंशा रखी, तो जांच का दायरा अभाव, अशिक्षा और बेरोजगारी रहा। दो दशक पहले जब सच्चर कमेटी या रंगनाथ मिश्र आयोग ने भारतीय मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण किया था तो उसका स्पष्ट लक्ष्य हाशिए पर पड़े इस तबके की बदहाली को समझना था। उन रिपोर्टों ने यह कड़वा सच जाहिर किया था कि विकास के बुनियादी पैमानों पर मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा अत्यंत दयनीय स्थिति में है। लेकिन उस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए ठोस और ईमानदार नीतिगत पहल करने के बजाय, आज जब अचानक उनकी संपत्तियों, वाहनों और नागरिक अधिकारों का हिसाब-किताब धार्मिक चश्मे से खंगालने की शुरुआत हुई है तो यह विकासोन्मुख पहल कम और एक विशेष प्रकार की निगरानी व्यवस्था ज्यादा नजर आती है। जब स्वास्थ्य और रोजगार जैसे कल्याणकारी सूचकांकों को किनारे कर केवल संपत्ति और अन्य जरूरी प्रशासनिक दस्तावेजों का विवरण मांगा जाने लगे तो सरकार की प्राथमिकताएं कटघरे में आ जाती हैं।
इस समूची कवायद का सबसे चिंताजनक पहलू वह षड्यंत्रकारी दृष्टिकोण है, जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समाज के बीच के स्वाभाविक और ऐतिहासिक बंधुत्व को कमजोर करता है। भारत के गांव, कस्बे और शहर सदियों से दोनों समुदायों की परस्पर आर्थिक-सामाजिक निर्भरता की बुनियाद पर खड़े हैं।
आत्मा की छलनी
बाजार में बैठा एक व्यापारी, खेत में पसीना बहाता किसान या किसी कारखाने में काम करता मजदूर कभी पड़ोस में रहनेवाले व्यक्ति से उसका धर्म पूछकर रिश्ते तय नहीं करता। महंगाई और बेरोजगारी की मार दोनों पर एक समान पड़ती है। लेकिन जब सत्ता के गलियारों से नागरिक पहचान, संपत्ति और वाहनों के धर्मवार आंकड़े छनकर सार्वजनिक बहसों और सोशल मीडिया के बेलगाम मंचों तक पहुंचेंगे तो उन्हें वास्तविक संदर्भों से काटकर पेश किया जाएगा। एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह भ्रामक नैरेटिव गढ़ा जाएगा कि अल्पसंख्यक समाज संसाधनों पर कब्जा कर रहा है या जनसांख्यिकी को असंतुलित कर रहा है। यह नैरेटिव आम नागरिकों के मन में अपने ही पड़ोसियों के प्रति गहरा अविश्वास, ईर्ष्या और नफरत का बीज बोता चला जाएगा।
ऐसे समय में जब समाज पहले ही धर्म स्थलों के विवादों, बुलडोजर की मार और रोजमर्रा के प्रशासनिक दबावों का सामना कर रहा है, तब यह नई कवायद मुसलमानों को एक स्थायी भय में धकेलती नजर आती है। इसके साथ ही, यह बहुसंख्यक समाज को भी एक काल्पनिक खौफ में उलझाए रखती है, ताकि आम अवाम का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे वास्तविक मुद्दों से भटका रहे। राजनीतिक लाभ के लिए समाज के बीच यह मनोवैज्ञानिक दीवार खड़ी करना मुल्क की आत्मा को छलनी करने के समान है।
संविधान के अनुच्छेद १४ और १५ किसी भी नागरिक को धर्म के आधार पर राज्य के भेदभावपूर्ण रवैये से सुरक्षा की गारंटी देते हैं। किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में किसी भी नागरिक का राज्य से रिश्ता मात्र धार्मिक पहचान के जरिए नहीं, बल्कि अधिकारों के संवैधानिक पुल से जुड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी निजता और गरिमा को बुनियादी अधिकार माना है। ऐसे में किसी एक समाज को बार-बार अपनी संपत्ति और नागरिकता का हिसाब देने के लिए विवश करना उसकी गरिमा पर सीधा प्रहार है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत का शासन नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ है हर अल्पसंख्यक और कमजोर वर्ग के अधिकारों की बिना शर्त रक्षा करना। भारत की असली ताकत उसकी समावेशी गंगा-जमुनी तहजीब है। यह जरूरी है कि आम जनमानस रोटी, रोजगार और भविष्य के असल सवालों को धर्म की राजनीति से ऊपर रखे। जब तक समाज एकजुट होकर इस विभाजनकारी रणनीति को खारिज नहीं करेगा, तब तक देश के लोकतांत्रिक मूल्य और सामाजिक समरसता खतरे में ही रहेंगे।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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