मुख्यपृष्ठनए समाचार‘भाई चाहिए था तो निर्दोष को क्यों पकड़ा?’

‘भाई चाहिए था तो निर्दोष को क्यों पकड़ा?’

-इलाहाबाद हाईकोर्ट की पुलिस को फटकार; चार दिन अवैध हिरासत पर ४० हजार मुआवजा, रकम जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली जाएगी

किसी आरोपी को आत्मसमर्पण कराने के लिए उसके निर्दोष परिजन को थाने में बंद रखना पुलिस की वैध रणनीति नहीं हो सकती। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में पुलिस की ‘दबाव बनाने की रणनीति’ पर कड़ी नाराजगी जताते हुए चार दिन अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ४० हजार मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने यह रकम जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूलने का भी निर्देश दिया। मामले में याचिकाकर्ता के भाई पर हत्या के प्रयास सहित गंभीर आरोप थे। जांच अधिकारी ने अदालत में स्वीकार किया कि थाना प्रभारी के निर्देश पर याचिकाकर्ता को २३ जून को घर से लाया गया था। कॉल रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज से वह २३ से २६ जून तक थाने में मौजूद पाया गया। अदालत ने पाया कि उसका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं था। पीठ ने साफ कहा कि वास्तविक आरोपी पर दबाव बनाने के लिए निर्दोष रिश्तेदार की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती। अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा तो ऐसी ‘दबाव वाली हिरासतों’ की विभागीय निगरानी आखिर कहां थी?

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