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संपादकीय : संगीत नाटक ‘सियार के पिल्ले’

इतिहास बताता है कि जब मुंबई जागती है तो देश की आंखों पर से पर्दा हट जाता है। बेईमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई में निकले महाविराट मोर्चे ने यही साबित किया है। मोर्चा भले ही ‘ठाकरे’ का था, लेकिन महाविकास आघाडी सहित कई लोकतंत्रप्रेमी संगठनों और जनता ने ज्ञानेश के खिलाफ इस मोर्चे में हिस्सा लिया। मोर्चे में शामिल लाखों लोगों की सीधी-सरल मांग थी, ‘महाराष्ट्र में लागू की गई ‘एसआईआर’ प्रक्रिया रद्द करो। ईवीएम हटाकर दोबारा बैलेट पेपर से चुनाव कराओ,’ और यह मांग पूरी तरह न्यायसंगत है। इतने बड़े मोर्चे पर भाजपा के भेड़ियों ने क्या प्रतिक्रिया दी? हमारे मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा, ‘ठाकरे अपनी जमीन तलाश रहे हैं, इसीलिए मोर्चा निकाला। वे अपनी याददाश्त खो चुके हैं,’ वहीं मंत्री शेलार ने कहा कि ‘यह मोर्चा मामूली है और इनकी मांगें ‘कोल्हेकुई’ यानी सियार की रोने जैसी हैं।’ भ्रष्ट चुनाव आयोग एक झटके में करोड़ों लोगों का मताधिकार छीनकर भाजपा की जीत में हाथ बंटाता है, इसे ‘कोल्हेकुई’ (सियार का रोना) कहना जनता का अपमान है। चलिए, अगर मान भी लें कि विपक्षी दलों का यह मोर्चा ‘कोल्हेकुई’ सियार का रोना जैसा ही है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि वोट के अधिकार से वंचित करने वाली ‘एसआईआर’ प्रक्रिया पूरी तरह मनमानी है। श्री भुइयां आगे कहते हैं, ‘करोड़ों नागरिकों को मतदान के
अधिकार से वंचित करनेवाली
कोई भी प्रक्रिया बुनियादी तौर पर मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करनेवाली है।’ वे कहते हैं, ‘मतदाता सूची से सिर्फ मृत मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। किसी भी सूरत में मौजूदा मतदाता का नाम उसे बिना पूर्व सूचना दिए और अपनी बात रखने का अवसर दिए बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता।’ इतने बेबाक विचार रखनेवाले न्यायाधीश भुइयां ने भी क्या ‘कोल्हेकुई’ ‘सियार का रोना’ किया है, भाजपा के ये मेंढक ऐसा कहना चाहते हैं? ‘एसआईआर’ दरअसल खुलेआम भाजपा को जीत दिलाने में मदद करनेवाली योजना है और ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की गरिमा भाजपा के चरणों में समर्पित कर दी है। भाजपा ने कई राज्य सिर्फ ज्ञानेश कुमार जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की बेईमानी की बदौलत जीते हैं। न्यायाधीश भुइयां कहते हैं, ‘भारतीय नागरिकों के व्यक्तित्व से मतदान का अधिकार या मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का अधिकार अलग नहीं किया जा सकता। यह तो शरीर से आत्मा निकाल लेने जैसा होगा।’ चुनाव आयोग ने भारत की मतदाता सूची से मनमाने तरीके से १३ करोड़ लोगों के नाम हटा दिए। महाराष्ट्र से दो करोड़ लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। यह एक प्रकार की सीनाजोरी है और इसके खिलाफ जब लोग सड़कों पर उतरकर मोर्चा निकालते हैं तो भाजपा को यह रोना-धोना या ‘कोल्हेकुई’ यानी सियार का रोना लगता है। यह
सत्ता का घमंड
है और भाजपा ज्ञानेश कुमार जैसे चोरों को शह देकर इस सत्ता का उपभोग कर रही है। मुंबई में लाखों लोग हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर उतरे। उनके इस प्रदर्शन को ‘रोना-धोना’ कहना तिरंगे का भी अपमान है। मोदी जैसा इंसान रोज रोने का नाटक करता है। ऐसा कोई अकेला व्यक्ति रोए तो उसे ‘रोना’ कहा जा सकता है, लेकिन जब पांच-दस लाख लोग एक साथ मिलकर रोने लगते हैं तो ऐसा तूफान उठते देर नहीं लगती, जिसमें तानाशाही की सत्ता उखड़कर गिर जाती है। उस ‘रोने-धोने’ से बगावत की आग भड़क उठती है। हमारे देश में अब वैसी आग भड़कनी शुरू हो चुकी है। न्यायाधीश भुइयां का ‘एसआईआर’ पर दिया गया यह बेबाक बयान इस आग को नैतिक ताकत देनेवाला है। पूर्व गृह सचिव आर. के. सिंह ने भी भाजपा वालों की भाषा में ‘सियार का रोना’ ही किया है कि ‘चुनाव आयोग द्वारा देशभर में चलाई गई ‘एसआईआर’ प्रक्रिया पूरी तरह गैर-कानूनी है। बिना किसी उचित जांच-पड़ताल और बिना कोई नोटिस या सुनवाई किए लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गैर-कानूनी ढंग से हटा दिए गए हैं। यह हरकत कानून की धारा २२ का उल्लंघन है।’ आर. के. सिंह न केवल देश के गृह सचिव रहे हैं, बल्कि मोदी के केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल थे। फिर इतना काबिल अधिकारी ‘एसआईआर’ के बारे में जो बेबाकी से कह रहा है, क्या वह ‘सियार का रोना है’ ‘कोल्हेकुई’ है, फडणवीस और उनके साथियों को यह बात स्पष्ट करनी चाहिए। मराठी रंगमंच पर ‘सूर्याची पिल्ले’ (सूर्य के बच्चे) नाम का एक नाटक बहुत मशहूर हुआ था। फडणवीस और शेलार वगैरा की यह ‘कुई-कुई’ (‘रोना-धोना’) देखते हुए संघ विचारधारा के किसी नाटककार को ‘कोल्ह्याची पिल्ले’ (सियार के पिल्ले) नाम से तीन-चार अंकों का संगीत नाटक रंगमंच पर लाने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए!

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