मुख्यपृष्ठटॉप समाचारज्ञानेश विसर्जन तय!

ज्ञानेश विसर्जन तय!

-सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, घर के दो आयुक्तों की १४ आपत्तियां और पूर्व चुनाव आयुक्तों के सवालों ने सीईसी को घेरा
-जस्टिस भुइयां बोले; लाखों का वोट छीनना मनमानी; पूर्व जस्टिस नरीमन की चेतावनी; ‘लोकतंत्र का दिल’ खतरे में

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

जिस चुनाव आयोग को देश के लोकतंत्र का निष्पक्ष अंपायर माना जाता है, उसी निर्वाचन आयोग के मुखिया ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली अब अदालत, आयोग के भीतर बैठे दो चुनाव आयुक्तों, पूर्व चुनाव आयुक्तों, न्यायाधीशों और विपक्ष; सभी के सवालों के घेरे में आ गई है। सोमवार, ५ अक्टूबर को मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर पहुंचा तो अदालत ने केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांग लिया। सबसे बड़ा सवाल वही है जो पिछले दिनों आयोग के अंदर से उठा; क्या तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले ले सकते हैं?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।
फॉर्म-६ पर सुप्रीम सवाल, ‘हमने बदलाव मंजूर नहीं किया’
सोमवार की सुनवाई में एक और बड़ा झटका फॉर्म-६ विवाद को लेकर आया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-६ में किए गए किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने संकेत दिया कि चुनाव आयोग की रिपोर्ट आने के बाद यह देखा जाएगा कि फॉर्म में परिवर्तन आखिर किसके निर्देश पर और किस अधिकार के तहत हुआ। विवाद इसलिए गंभीर है क्योंकि फॉर्म-६ नए मतदाता के पंजीकरण का वैधानिक फॉर्म है। इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि ऑनलाइन फॉर्म में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। आयोग के दो सदस्यों; सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इसे रिकॉर्ड पर ‘अवैध’ और ‘अनधिकृत’ बताते हुए हटाने को कहा था। उनकी आपत्ति थी कि इसके लिए पहले रजिस्ट्रेशन आफ इलेक्टोरल रुल, १९६० में निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी। बाद में आयोग ने विवादित घोषणा हटाई। यही मुद्दा सोमवार को और विस्फोटक हुआ क्योंकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म-६ में ‘अवैध और एकतरफा’ बदलाव किए। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने राहुल गांधी के आरोप को ‘भ्रामक’ बताया है।
पूर्व जस्टिस नरीमन का हमला; ‘राइट टू वोट ग्रेट पेरिल में’
इसके ठीक बाद पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने राजकोट में चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर कहीं अधिक सीधी टिप्पणी की। नरीमन ने कहा कि आम नागरिक का वोट देने का अधिकार आज ‘ग्रेट पेरिल’ यानी गंभीर खतरे में है। उन्होंने चुनाव आयोग की नियुक्ति व्यवस्था पर भी सवाल उठाया और ऐसे निर्वाचन आयोग को लेकर चिंता जताई जो सही ढंग से काम न करे। पश्चिम बंगाल एसआईआर में मतदाताओं के नाम हटने से जुड़े उदाहरण देते हुए उन्होंने इसे नागरिकों को मतदाता सूची से गैर-कानूनी तरीके से बाहर किए जाने का गंभीर मामला बताया और सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की उम्मीद जताई। नरीमन की चिंता केवल एसआईआर तक सीमित नहीं रही। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली मौजूदा व्यवस्था को भी लोकतांत्रिक संस्थागत स्वतंत्रता के संदर्भ में ‘रेड फ्लैग’ बताया।
जस्टिस भुइयां की दो टूक; ‘शरीर से आत्मा निकालने जैसा’
विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी ने बहस को संवैधानिक धरातल पर पहुंचा दिया। हैदराबाद के नालसर विश्वविद्यालय में उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करती है और उन्हें अपने ही देश में वोट के अधिकार के बिना ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ बना देती है तो ऐसी प्रक्रिया ‘स्वभावतः मनमानी’ होगी। उन्होंने कहा कि नागरिक से वोट का अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार अलग करना शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा। ऐसी व्यापक वंचना अनुच्छेद १४ और ३२६ से टकराएगी और संवैधानिक व्यवस्था के मूल पर प्रहार करेगी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी मतदान के अधिकार और बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने वाली किसी भी प्रक्रिया के संवैधानिक परिणामों पर थी। टिप्पणी ठीक उसी समय आई जब एसआईआर और मतदाता नाम कटने को लेकर चुनाव आयोग कटघरे में है।
पांच पूर्व जजों की अलग पड़ताल भी शुरू
मामला केवल सार्वजनिक बयानों तक सीमित नहीं है। लायर एसोशिएशन फार कांस्टीट्यूशन ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस मदन बी. लोकुर की अध्यक्षता में पांच पूर्व न्यायाधीशों का स्वतंत्र पैनल बनाया है। यह पैनल एसआईआर की संवैधानिक और वैधानिक वैधता, उसकी पद्धति तथा पात्र मतदाताओं पर प्रभाव की जांच करेगा। सार्वजनिक सुनवाई और फील्ड रिसर्च भी प्रस्तावित हैं। रिपोर्ट दिसंबर तक आने की बात कही गई है। यानी एसआईआर पर अब एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं हैं और दूसरी तरफ पूर्व न्यायाधीशों की स्वतंत्र पड़ताल भी शुरू हो चुकी है।
अपने भी बोले; तीन पूर्व चुनाव अधिकारियों ने उठाए सवाल
निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वालों में उसके अपने पुराने मुखिया भी शामिल हैं। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में कम-से-कम तीन प्रमुख पूर्व चुनाव पदाधिकारी; दो पूर्व ण्Eण् और एक पूर्व Eण् मौजूदा विवाद पर गंभीर सवाल उठा चुके हैं।
एस.वाई. कुरैशी; ‘सीईसी का दूसरा नाम निर्वाचन आयोग नहीं’
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने सबसे बुनियादी सवाल उठाया ‘चीफ इलेक्शन कमीशनर इज नाट द इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया’ कुरैशी ने कहा कि यदि दो सदस्यों की आपत्तियां रिकॉर्ड पर हैं तो यह पता चलना चाहिए कि आयोग के नाम पर लिए गए निर्णय वास्तव में पूरे आयोग के निर्णय थे या नहीं। उन्होंने तीनों आयुक्तों को एक साथ प्रेस कॉन्प्रâेंस कर स्थिति स्पष्ट करने तक का सुझाव दिया और लिखा कि यदि आयोग स्वयं कार्रवाई नहीं करेगा तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।
तेजस्वी भी बोले; सीईसी हटाओ
राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी चुनाव आयोग पर भाजपा के पक्ष में इस्तेमाल होने का आरोप लगाया और ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की। उन्होंने बिहार और पश्चिम बंगाल समेत चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
अशोक लवासा; ‘ट्रस्ट डेफिसिट पैदा हुआ’
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा कि आयोग और जनता के बीच ‘ट्रस्ट डिफीसिट’ पैदा हुआ है और इस धारणा के निर्माण में आयोग की अपनी भूमिका भी है। उन्होंने आयोग से पूरे तथ्य सामने रखने और एसआईआर के तीसरे चरण को रोककर पुराने मतदाता रोल पर लौटने तक की बात कही। इस तरह अब आयोग के बाहर खड़े राजनीतिक दल ही नहीं, आयोग को भीतर से जानने वाले पूर्व पदाधिकारी भी उसकी पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
राहुल का आरोप; ‘फॉर्म-६ किसने बदलवाया?’
राहुल गांधी पिछले कई महीनों से चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाते रहे हैं। फॉर्म-६ विवाद सामने आने के बाद उन्होंने सवाल किया कि बदलाव का आदेश किसने दिया, तकनीकी एजेंसी टीसीएस को किसने निर्देश दिया और क्या उस पर किसी तरह का दबाव था। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद उन्होंने आरोप दोहराया कि फॉर्म-६ में बदलाव ‘अवैध और एकतरफा’ था। निर्वाचन आयोग ने इस आरोप को ‘misleading’ बताते हुए खारिज किया है।
ममता; इस्तीफा नहीं तो आंदोलन जारी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर भाजपा को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए किया गया। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए घोषणा की कि उनके पद छोड़ने तक आंदोलन जारी रहेगा।
खरगे बोले; सरकार की ‘कठपुतली’, हटाओ
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ज्ञानेश कुमार को मोदी सरकार की ‘कठपुतली’ बताते हुए पद से हटाने की मांग की। कांग्रेस कार्यसमिति ने मतदाता सूची से नाम हटने, आंकड़ों की उपलब्धता और आयोग की पारदर्शिता को लेकर स्वतंत्र जांच समेत पांच मांगें रखीं। ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप और मांगें हैं, अभी किसी अदालत द्वारा सिद्ध निष्कर्ष नहीं।

अन्य समाचार