‘कहानी घर घर की’ और ‘कुमकुम’ के निर्देशक स्वप्निल महालिंग उठाएंगे ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा; मुंबई के बेकाबू शोर से लेकर आम आदमी की बेचैनी तक, डॉक्यूमेंट्री में खुलेगी महानगरीय जिंदगी की कड़वी हकीकत
मुंबई। चमकती स्क्रीन पर पारिवारिक कहानियां गढ़ने वाले निर्देशक स्वप्निल महालिंग अब महानगरों की उस कड़वी हकीकत को पर्दे पर उतारने की तैयारी में हैं, जो हर दिन करोड़ों लोगों की जिंदगी में खामोशी से जहर घोल रही है। यह हकीकत है ध्वनि प्रदूषण की। ‘कहानी घर घर की’, ‘कुमकुम’ और ‘सूर्यपुत्र कर्ण’ जैसे चर्चित टेलीविजन धारावाहिकों से जुड़े रहे महालिंग अब ध्वनि प्रदूषण के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभावों पर एक विस्तृत सामाजिक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे हैं। इस परियोजना का केंद्र मुंबई जैसे महानगरों में बढ़ता शोर, बेकाबू ट्रैफिक, निर्माण कार्यों की आवाजें और तेज ध्वनि वाले सार्वजनिक आयोजन होंगे।
हॉर्न, डीजे और कंस्ट्रक्शन के शोर पर कैमरे की नजर
शहर की सड़कों पर लगातार बजते हॉर्न, निर्माण स्थलों पर मशीनों की तेज आवाज, औद्योगिक इकाइयों का शोर और त्योहारों व सार्वजनिक आयोजनों में लाउडस्पीकरों की तेज ध्वनि आम जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इस शोर की कीमत कौन चुका रहा है? इस सवाल को डॉक्यूमेंट्री के जरिए सामने लाने की कोशिश होगी। फिल्म में शहरी शोर को वास्तविक परिस्थितियों में दर्ज करने के साथ उसके मानवीय प्रभावों को भी रेखांकित किया जाएगा।
उत्सवों पर नहीं, शोर की अति पर सवाल
निर्देशक की इस पहल का उद्देश्य किसी धर्म, त्योहार या सांस्कृतिक परंपरा को निशाना बनाना नहीं, बल्कि खुशियां मनाने और दूसरों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन की जरूरत को सामने लाना है। सवाल यह है कि मनोरंजन और उत्सव के नाम पर पैदा होने वाला अत्यधिक शोर किसी दूसरे व्यक्ति की नींद, स्वास्थ्य और मानसिक शांति छीनने का कारण क्यों बने?
डॉक्टरों और पर्यावरण विशेषज्ञों की भी होगी भागीदारी
इस डॉक्यूमेंट्री में पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, न्यूरोलॉजिस्ट और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की योजना है। इनके माध्यम से ध्वनि प्रदूषण और नींद में बाधा, तनाव तथा सुनने की क्षमता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को समझाया जाएगा। फिल्म का जोर केवल डेसिबल के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि उन लोगों के अनुभवों पर भी रहेगा, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी लगातार शोर के बीच गुजरती है।
स्वप्निल महालिंग के अनुसार, ध्वनि प्रदूषण को केवल तकनीकी पैमाने से नहीं समझा जा सकता। यह मनुष्य की गरिमा, मानसिक शांति और स्वस्थ वातावरण में जीने के अधिकार से भी जुड़ा विषय है।
थिएटर से टेलीविजन तक, अब सामाजिक सरोकार की ओर
महालिंग का रचनात्मक सफर रंगमंच से शुरू हुआ। वे सागर सरहदी और सत्यदेव दुबे जैसे दिग्गजों के साथ पृथ्वी थिएटर में काम कर चुके हैं। टेलीविजन में उन्होंने ‘कुमकुम’, ‘कहानी घर घर की’, ‘सूर्यपुत्र कर्ण’ और ‘मीरा’ जैसे धारावाहिकों से जुड़कर अपनी पहचान बनाई। इसके अलावा ‘सावधान इंडिया’ और ‘क्राइम पेट्रोल’ जैसे कार्यक्रमों के लिए लेखन कार्य भी किया। वे मराठी और अन्य फिल्म परियोजनाओं से भी जुड़े रहे हैं।
अब ध्वनि प्रदूषण पर उनकी प्रस्तावित डॉक्यूमेंट्री मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक जागरूकता का माध्यम बनने की कोशिश करेगी। महानगरों में बढ़ते शोर के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—विकास और उत्सव की दौड़ में क्या इंसान को सुकून से जीने का अधिकार पीछे छूटता जा रहा है?
