अनिल तिवारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार संसद में कहा था कि मेरी राजनीतिक सूझबूझ पर किसी को शक नहीं होना चाहिए। शायद उन्होंने सच ही कहा था। मोदी और शाह की शख्सियत को ध्यान में रखते हुए यदि गंभीरता से सोचें तो इसे आसानी से समझा जा सकता है। समझा जा सकता है कि गहरी राजनीतिक सूझबूझ का दावा करने वाला वही व्यक्ति आज देश का मिजाज क्यों नहीं समझ पा रहा है? युवाओं का गुस्सा शांत करवाने के बजाय आग में घी क्यों डाले जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें भी कोई राजनीतिक सूझबूझ ही हो? शायद यह सब भी किसी सोचे-समझे गुणा-गणित के तहत होने दिया जा रहा हो? ज्ञानेश बाबू का तो पता नहीं, पर शायद योगी आदित्यनाथ का ही विकेट लेने की तैयारी हो?
२०२४ के लोकसभा चुनाव में ४०० प्लस का सपना रखने वाली मोदी सरकार यदि स्पष्ट बहुमत तक भी नहीं पहुंच पाई तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था उत्तर प्रदेश में भाजपा की करारी हार। वह हार जिसका ठीकरा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंसूबों पर फोड़ा गया और लंबे वक्त तक उन्हें पद से खींचने के भरसक प्रयास होते रहे। परंतु योगी को केसरिया कवच प्राप्त वही भगवा चोला आड़े आ गया। मोदी और शाह चाहकर भी योगी को यूपी की सत्ता से बेदखल नहीं कर पाए। तब से उन्हें बखूबी इस बात का इल्म हो कि योगी को वे इस तरह और इतनी आसानी से तो नहीं हटा पाएंगे। उन्हें उपयुक्त मौके का इंतजार था और वह मौका सौभाग्य से ठीक २०२७ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें अनजाने में ही मिल गया।
शायद अब उनकी सूझबूझ कहती हो कि युवा जितना आक्रोशित होगा, देश में भाजपा विरोधी जितना माहौल बनाएगा, उतना ही खामियाजा योगी को इस चुनाव में भुगतना होगा। सत्ता की सोच हो कि ज्ञानेश कुमार को तो कभी भी निपटाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद भी दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंका जा सकता है और युवाओं का गुस्सा शांत हो सकता है। परंतु योगी का हिसाब आज नहीं हुआ तो शायद कभी नहीं होगा। इसलिए बहुत संभव है कि मोदी और शाह यह जानते हुए भी कि युवा आक्रोश की इस आग में भाजपा झुलस रही है, वे इसमें घी डालने का काम कर रहे हैं। इसी उम्मीद में कि आज भले ही उनका हाथ झुलसे पर कल को योगी आदित्यनाथ की पूरी राजनीतिक प्रतिष्ठा इसमें जलकर खाक हो जाएगी। यह उनकी पुरानी कार्यशैली है। कभी शिवराज सिंह चौहान को निपटाने के लिए भी उन्होंने ऐसी ही ढील छोड़ी थी। नतीजे में एमपी की पतंग कट गई और जब मामा मिमियाने लगे तब जाकर सिंधिया की सेंध लगाकर उनकी झोली में सत्ता का सत्तू डाल दिया गया।
