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आलमआरा-मास्टर विट्ठल और जिन्ना

डाॅ. रवीन्द्र कुमार

1913 में राजा हरिश्चंद हिन्दुस्थान की पहली मूक फिल्म बनी। फिल्म का कोई भी प्रिंट आज उपलब्ध नहीं है। किंतु छुटपुट चित्र (स्टिल) दिख जाते हैं। आप जानते ही हैं कि इसे बनाने में दादा साब फाल्के को कितनी मुश्किलें दरपेश आईं थीं। यहां तक कि फिल्म की नायिका की उन्होंने बहुत तलाश की मगर सफलता नहीं मिली। बदनाम गलियों की महिलाओं ने भी मना कर दिया था। अंतत: नायिका की भूमिका अन्ना सालुन्के नामक युवा पुरुष से करानी पड़ी। सालुन्के ग्रांट रोड के एक चाय के ढाबे पर 10/- रुपये मासिक के वेतन पर काम करता था। दादासाब फाल्के ने 15/- महीने पर उसे काम पर रख लिया। सालुन्के ने पाँच फिल्मों में भूमिकाएं महिला वेष में कीं। और तो और एक फिल्म ‘लंका दहन’ में तो उसने पुरुष और महिला दोनों पात्र (राम और सीता) की भूमिका निभाई। इस प्रकार यह भारतीय सिनेमा का पहला ‘डबल रोल’ था।
अलाम आरा 1931 में आयी एक ‘कस्टूय्म ड्रामा’ थी। कामपुर के वृद्ध राजा की दो रानियाँ थीं—दिलबहार और नवबहार। एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि नवबहार राजा के उत्तराधिकारी को जन्म देगी, जिससे दोनों रानियों के बीच अनबन शुरू हो जाती है। इस भविष्यवाणी से क्रोधित होकर दिलबहार सेना प्रमुख आदिल को अपने प्रेमपाश में फंसाना चाहती है, लेकिन आदिल उसके प्रस्ताव को ठुकरा देता है। इससे नाराज़ होकर दिलबहार आदिल को कालकोठरी में कैद करवा देती है और उसकी छोटी बेटी ‘आलम आरा’ को राज्य से निर्वासित कर देती है। आलम आरा का पालन-पोषण बंजारों के बीच होता है। बड़ी होने पर वह वापस महल लौटती है और राजा के राजकुमार से उसे प्रेम हो जाता है। कहानी के अंत में बंजारों के सहयोग से महल की साजिशें और दिलबहार के षड्यंत्रों का पर्दाफाश होता है। आदिल को जेल से रिहा किया जाता है, दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है, और राजकुमार का विवाह आलम आरा से हो जाता है । जो एक हार के चारों ओर घूमता था। कहानी और संवाद जोसेफ डेविड की थे, जो उस समय के लोकप्रिय नाटककार थे, भाषा में उर्दू की बहुलता थी और पारसी नाटकीय शैली थी जिसमें आग़ा हश्र ने अपनाया और बढ़ाया था। फिल्म का निर्देशन अर्देशिर ईरानी ने किया था। आदिल ईरानी फोटोग्राफर थे। कलाकारों में मास्टर विट्ठल (नायक), जुबैदा, जिल्लो बाई, पृथ्वीराज कपूर, डब्ल्यू.एम. खान, इशरत सुल्ताना (बिब्बो) और जगदीश सेठी शामिल थे। जुबेदा की शादी हैदराबाद के महाराज नरसिंगीर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से हुई थी। उनका एक बेटा था जिसका नाम हुमायूं धनराजगीर था। उन्होंने 1930 के दशक के अंत में फिल्मों से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। उनकी आखिरी फिल्म ‘निर्दोष अबला’ थी, जो 1949 में आई थी। उनकी फिल्मोग्राफी के हिसाब से उन्होने 66 से अधिक फिल्मों में काम किया। यहां ये उल्लेखनीय है कि ज़ुबेदा नवाब सिदी इब्राहिम और फातिमा बेगम की संतान थी। फातिमा बेगम खुद फिल्म निर्देशक, प्रोड्यूसर और स्क्रीन प्ले राइटर थी।
मास्टर विट्ठल (1906-1969) इन सभी में सबसे महंगे नायक थे। उनकी पगार एक हजार रुपये प्रति माह थी। आलम आरा 14 मार्च 1931 को बॉम्बे में रिलीज़ की गयी थी। मैजेस्टिक थिएटर में भीड़ और भीड़ का जोश देखने लायक था। फिल्म की पब्लिसिटी भी अद्भुत ढंग से की गई थी। मूक फिल्मों से तुलना करते हुए लिखा गया था कि ‘तस्वीर बोल उठीं हैं’। ‘पात्र जिंदा हो गये हैं’ आदि। शो दोपहर 3 बजे का था लेकिन सुबह से ही भीड़ जमा हो गई थी। भीड़ को रोकने के लिए पुलिस को बुलाना पड़ा। टिकट 50 रुपये के प्रीमियम पर ब्लैक में बेची जा रही थी। अर्देशिर ईरानी ने शो शुरू होने से पहले एक छोटा सा भाषण भी दिया। इस फिल्म में 12 गाने थे, विशेष रूप से दो गाने एकदम हिट हो गये। ” बदला दिलवायेगा या रब तू सितमगरों से…” ज़ुबैदा (नायिका) पर फिल्माया और उन्हीं के द्वारा गाया “दे दे खुदा के नाम पर प्यारे , ताकत है अगर देने की”। यूं कहने को अलामारा की 14 मार्च 1931को रिलीज से पहले पहला गीत कलकत्ता के मदन थिएटर का था, जिसे 4 फरवरी 1931 को बॉम्बे के एम्पायर थिएटर में प्रदर्शित किया गया था। इस गीत को मुन्नी बाई ने गाया था। “अपने मौला की मैं जोगन बनूंगी” 1931 की अलामारा ने अन्य फिल्म निर्माताओं को इतना प्रेरित किया कि एक और अलामारा 1956 में बनायी गयी थी। तीसरी आलमआरा 1973 में बनाई गई। दोनों (1956, 1973) का निर्देशन नानूभाई वकील ने किया था। आश्चर्यजनक रूप से, 1931 के आलमारा के अभिनेता वजीर मोहम्मद खान ने 1956 आलमारा और 1973 आलमारा में भी अपनी भूमिकाएं दोहराई। आलमारा 1931 में पृथ्वीराज कपूर, इशरत सुल्ताना (बिब्बो), सोहराब मोदी, जगदीश सेठी, मास्टर विट्ठल और जुबैदा ने अभिनय किया था। 29 वर्षीय वजीर मोहम्मद खान ने वृद्ध फकीर की भूमिका निभाई थी। अपना गीत “दे दे खुदा के नाम पे प्यारे ताकत है कुछ देने की” गाया था।
आलमआरा 1956, में चित्रा, दलजीत और डब्ल्यू.एम. खान (फकीर) थे।
आलमआरा 1973 में नाजिमा, अजीत, जयराज और डब्ल्यू.एम. खान ने अभिनय किया।
आलमआरा ने ऐसा तूफानी ट्रैंड चलाया कि 1931 में ही 28 टॉकी फिल्में बनीं/रिलीज़ हुईं। जैसे शकुंतला, दौलत का नशा, गृह लक्ष्मी। इनमें हिंदी फिल्में (23) बांग्ला (3) तमिल (1) तेलुगू (1) थी। 1932 में बोलती फिल्मों का प्रोडक्शन लगभग दोगुना हो गया।
पहली बोलती फिल्म के नायक थे मास्टर विट्ठल, जिन्होंने अपनी शुरुआत एक बाल कलाकार के रूप में की थी। बाद में बाबूराव पेंटर की मदद से उनको मूक फिल्में एक के बाद एक मिलतीं गईं। वे अपने वक़्त के खूब पाॅपुलर नायक थे। वे बाद में विजय और शंकर भट्ट भाईयों और शांति लाल दवे के स्टूडियो शारदा स्टुडियो में शामिल हो गये थे। उन्होंने सुवर्ण कमल 1926, हीरा सुंदरी 1928 चिराग-ए-कोहिस्तान 1929। मास्टर विट्ठल कसरती बदन के पहलवान टाइप व्यक्ति थे। फिल्मों में स्टंट भूमिकाएं भी उन्होंने निभाईं। जब पता चला अर्देशर ईरानी अपनी बोलती फिल्म के लिये नायक की तलाश में हैं तो सभी (प्रमुख प्रतिस्पर्धी थे महबूब खान) इस ऐतहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना चाहते थे। जब वे सागर मूवी टोन (अर्देशर ईरानी) के आलम आरा 1931 प्रोजेक्ट का हिस्सा बने तो शारदा स्टूडियो (जिसके अनुबंध में वे थे) ने उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया। उनके मामले का बचाव किसी और ने नहीं, बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था। मास्टर विट्ठल ने केस जीत लिया। लेकिन जल्द ही उनको अपनी गलती का एहसास हो गया। उनकी जो भी ख्याति, महिमा और स्टारडम था वह मूक फिल्मों का था। यहां उन्हें न केवल डाॅयलाॅग बोलने थे बल्कि गीत भी गाने थे। उनका उच्चारण मराठी बहुल था। गीत गाने के लिये सर्वथा अयोग्य साबित हुए। दरअसल, उनकी स्टंटमैन की छवि मूक फिल्मों की देन थी। कुछ और फिल्मों के बाद उन्होंने फिर मराठी फिल्मों का रुख कर लिया। आलमआरा में भी उनकी खराब हिंदी और खराब डाॅयलाॅग डिलिवरी के कारण पूरी फिल्म में जादू के असर से उन्हें बेहोशी, अर्ध चेतन/ट्रान्स की हालत में दिखाया गया था। यूं उन की तुलना हाॅलीवुड के अभिनेता डगलस फेयरबैंक्स से की जाती थी।
मास्टर विट्ठल 1924 से मूक/ मराठी सिनेमा में सक्रिय रहे थे। रतन मंजरी (1926) में मुख्य भूमिका निभाने से पहले एक फिल्म तकनीशियन और नर्तक के रूप में भी उन्होंने काम किया था। मूक स्टंट फिल्मों में शानदार भूमिकाएं की थीं जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया था। जब 1956 में बाॅम्बे में भारतीय सिनेमा की सिल्वर जुबिली (25 बरस) मनाई गई तब वे और उनकी नायिका ज़ुबेदा विशेष अतिथि थे। उसके बाद 1966 में अपनी अंतिम फिल्म तक उन्होंने हिन्दी फिल्मों की तरफ पलट कर नहीं देखा।
1924 से 1966 तक के अपने 42 साल के करियर के दौरान वे 90 से अधिक फिल्मों में दिखाई दिए, दो फिल्मों का निर्देशन भी किया और एक फिल्म के लिए संगीत की रचना भी की। हिंदी फिल्मों की बात करें तो मास्टर विट्ठल, 1944 की ब्लॉकबस्टर फिल्म रामशास्त्री में एक साइड रोल में नजर आये थे। उनकी आखिरी मराठी फिल्म 1966 में थी।

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