आखिरकार देश के गृहमंत्री अमित शाह प्रकट हुए और उन्होंने इंडिया गठबंधन पर हमला करने की कोशिश की। दरअसल, उस हमले का कोई नैतिक आधार नहीं है। इंडिया ब्लॉक और राहुल गांधी का हमला उन घोटालेबाज चुनाव आयुक्तों पर है, जो अमित शाह के ‘छोटा शकील’ शैली के गुर्गे हैं। ईवीएम घोटाला, करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाना और चुनाव आयोग की सफाई के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन आंदोलन कर रहा है और उसने इसके खिलाफ दिल्ली को दहला दिया है। सोमवार को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लाखों का मोर्चा निकला। उस पर बोलने के बजाय गृहमंत्री शाह ने एलान कर दिया कि सोमवार के विराट मोर्चे में सिर्फ आठ हजार लोग थे और ये आठ हजार लोग देश की आवाज नहीं बन सकते। २०२९ में भी कांग्रेस हार के लिए तैयार रहे, ऐसी फिजूल की बकबक गृहमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को करना दुर्भाग्यपूर्ण है। अमित शाह काफी समय बाद प्रकट हुए हैं। इतने दिनों से वे ‘अंडरग्राउंड’ थे। वे ऐसा कौन-सा चिंतन कर रहे थे कि देश जल रहा था और उन्हें समाधि की अवस्था में जाना पड़ा? शाह की सेहत को लेकर कई पुख्ता खबरें आती रहती हैं। कई वजहों से उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती और मौजूदा तनाव उनका दिमाग और शरीर झेल नहीं सकता, ये सब झूठा साबित हो, लेकिन उनकी नजर और कान के पर्दे कमजोर पड़ गए हैं। अगर ऐसा न होता तो लाखों के मोर्चे को उन्होंने आठ हजार का मोर्चा कहकर उसकी तौहीन न की होती। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस मोर्चे का छायांकन किया, इसे प्रसारित किया और इसे एक विशाल मोर्चा बताया, लेकिन गृहमंत्री के भूमिगत होने के कारण वे ज्ञानेश कुमार और सीमा खन्ना जैसे
आंकड़ा-विशेषज्ञों द्वारा दिए गए
आंकड़ों पर ही निर्भर हैं। शाह कहते हैं, ‘डेढ़ किलोमीटर के दायरे में आठ हजार लोग, क्या यह जनता का मोर्चा है?’ अमित शाह, फिर सिर्फ आठ हजार के मोर्चे के लिए आपने डेढ़ किलोमीटर के दायरे में ढाई लाख सशस्त्र पुलिस बल क्यों तैनात किए थे? दिल्ली के सौ-एक ‘हवलदार’ भी काफी होते। शाह कृष्ण मेनन मार्ग पर रहते हैं और उनके निवास स्थान के चारों ओर पांच किलोमीटर का क्षेत्र जनता के लिए बंद कर दिया गया है। फिर यह डर किस बात का? जिन्हें लाखों की भीड़ आठ हजार दिखती है, उन्हें अपनी आंखों का नंबर नए सिरे से जांच करवाना चाहिए। चश्मा बदलना चाहिए। कान के पर्दे साफ करके जनता का आक्रोश और गर्जना सुननी चाहिए। शाह की नजर विकलांग हो चुकी है और उनका मन भी ठिकाने पर नहीं है। गृहमंत्री के तौर पर भारत में उनके द्वारा की गई गुंडागर्दी के खिलाफ जनता निडर होकर सड़कों पर उतर आई है। महज आठ हजार के मोर्चे से डरकर अमित शाह और उनकी दिल्ली पुलिस ने इसके बाद ‘जंतर-मंतर’ पर प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी है और ‘जंतर-मंतर’ पर पाबंदी के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवा लड़कों को सलाखों के पीछे ठूंस दिया है। सरकार जब युवाओं से डरने लगती है, तो साबित होता है कि उसके पैर कांप रहे हैं। शाह ने चुनौती दी कि राहुल गांधी २०२९ की हार के लिए तैयार रहें। ऐसा लगा मानो शाह के मुंह से ज्ञानेश कुमार ही दहाड़ रहे हों। १३ करोड़ मतदाताओं के नाम ज्ञानेश कुमार ने
‘एसआईआर’ के नाम पर
हटा दिए हैं। यह बीजेपी की दादागीरी और शाह की गुंडागर्दी को जिताने के लिए किया गया है। ‘ईवीएम’ में सात फीसदी वोट कमलाबाई (बीजेपी) के पक्ष में ‘सेट’ किए जाते हैं और इसी वजह से बीजेपी जीतती आ रही है। ज्ञानेश कुमार, राजीव कुमार, सीमा खन्ना जैसे देशद्रोहियों ने लोकतंत्र का गला घोंटा है और गृहमंत्री शाह देश के इस दुश्मन की मदद से विपक्षी दलों को चुनौती दे रहे हैं। शाह का अपनी पिचकी जांघ पर ताल ठोककर चुनौती देना भारतीय संविधान की तौहीन करने जैसा है। शाह को प्रधानमंत्री बनने की जल्दी है और २०२९ से पहले ही वे मोदी की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। उसके बाद बीजेपी का खेल खत्म हो जाएगा, लेकिन शाह को बीजेपी के भीतर ही विरोध झेलना पड़ रहा है और वरिष्ठ मंत्रियों ने शाह के खिलाफ बगावत कर दी है। कम से कम उप-प्रधानमंत्री ही बना दो, यह उनकी इल्तिजा है। अमित शाह ने बीजेपी में राजनीतिक माफियाओं की भर्ती की। उनके दम पर वे प्रधानमंत्री बनने चले हैं और ज्ञानेश कुमार जैसे लोग शाह की गाड़ी के बैल हैं। शाह की मुराद पूरी नहीं होगी। या तो जन-आक्रोश के चलते ज्ञानेश कुमार को जाना पड़ेगा और २०२९ तक अमित शाह गृहमंत्री के पद से बेदखल हो चुके होंगे। जिनकी नजर कमजोर है, जिन्हें लाखों की भीड़ नहीं दिखती, ऐसे हताश और बौखलाए व्यक्ति को गृहमंत्री के पद पर नहीं रहना चाहिए। इस आदमी ने देश का जितना कबाड़ा करना था, कर दिया। अब वे देश पर अहसान करें और हमेशा के लिए भूमिगत हो जाएं। शाह के प्रकट होने से कोई तीर नहीं मार लिया जाएगा!
