प्रणव प्रियदर्शी
रेजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन–देश के जाने-माने एडवोकेट और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण के मुंह से निकले इस एक शब्द पर सत्ता पक्ष ऐसे लपक पड़ा है जैसे कई दिनों का भूखा कोई शख्स भोजन पर लपकता है। अब राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ मंत्री से लेकर छोटे-मोटे तमाम प्रवक्ता और टुटपुंजिये समर्थक तक सब यही राग अलाप रहे हैं कि ‘देखा, हम तो पहले से कह रहे थे। एसआईआर और ज्ञानेश कुमार तो बहाना है, असल में इन्हें मोदी जी को सत्ता से हटाना है।
लोकतंत्र की विशेषता
कांग्रेस ने बिना देर किए, साफ कहा कि ‘इसमें लाल बुझक्कड़ वाली तो कोई बात नहीं है। हम पहले दिन से खुलकर कह रहे हैं कि हम सत्ता परिवर्तन चाहते हैं।‘ वैसे भी लोकतंत्र में जब कोई विपक्षी दल सड़क पर उतरता है तो वह सरकार को एक और कार्यकाल देने की मांग तो नहीं करता। उसकी अपील, उसकी चाहत, उसका मकसद यही होता है कि इस सरकार को जल्द से जल्द उखाड़ फेंका जाए। उसमें यह बात अंतर्निहित होती है कि ऐसा लोकतांत्रिक ढंग से चुनावों के जरिए करना है। शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की सहज और अनिवार्य विशेषता है।
हिंसा नहीं, शांति
बावजूद इसके, सत्ता पक्ष इसे मुद्दा बना रहा है। चाहे प्रशांत भूषण हों या सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे तमाम अन्य आंदोलनकारी – किसी ने भी हिंसा का सहारा लेने की कोई बात नहीं की है और न ही लगातार व्यापक रूप ले रहे इस आंदोलन में हिंसा का कोई संकेत मिला है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अपनी हर अपील में यह बात जोड़ते हैं कि हमें जो भी करना है शांति से, प्यार-मोहब्बत से, लोकतांत्रिक ढंग से करेंगे।
ठोस वजहें
सत्ता पक्ष पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ रहा। उसकी तरफ से यह मंत्र-जाप जारी है कि ये आंदोलनकारी देश में हिंसा और अराजकता पैâलाना चाहते हैं। इनका असली मकसद ‘रेजीम चेंज’ है जिसे येन-केन-प्रकारेण पूरा करने पर ये तुले हैं। सरकार के इस रुख के पीछे ठोस वजहें भी हैं। उसे पता है कि चुनाव में धांधली का मुद्दा इतना आगे बढ़ गया है कि इससे पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। तमाम विपक्षी दल इस पर कमर कस चुके हैं। सीजेपी जैसा नवगठित संगठन हो या आईसा जैसे छात्र संगठन – कोई भी ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और एसआईआर की वापसी जैसे मांगों पर कोई समझौता नहीं कर सकता।
घिरी हुई सरकार
दूसरी ओर मोदी सरकार भी मजबूर है। इस मांग को स्वीकार कर लिया तो सत्तारूढ़ खेमे में अपने समर्थकों के बीच भी उसकी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी। उस स्थिति में अंदर से ही नेतृत्व परिवर्तन का भीषण दबाव बन जाएगा। वह दोनों तरफ से घिरी हुई महसूस कर रही है। न तो पीछे हट सकती है और न ही आगे बढ़ सकती है। वह कह तो रही है कि विपक्षी दलों में दम है तो चुनाव के जरिए उसे हराकर दिखाएं। लेकिन इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं है कि जब चुनाव प्रक्रिया ही पक्षपातपूर्ण है, एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट ही सरकार की मर्जी के अनुरूप बनाया जा रहा है तो फिर चुनावी चुनौती का मतलब ही क्या रह जाता है।
कोई विकल्प नहीं
ऐसे में सरकार के कर्ता-धर्ताओं को लगने लगा है कि देर-सवेर इस आंदोलन को ताकत से कुचल देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। संभवत: सरकार और सत्तारूढ़ पक्ष का एक अहम हिस्सा इसी की तैयारी कर रहा है। जंतर-मंतर पार्ट १ में जिस तरह से दिल्ली पुलिस के साथ सादी वर्दी में गुंडों की फौज उतरी हुई थी और इस दूसरे फेज में भी पुलिस की मौजूदगी में गुंडे प्रदर्शनकारियों पर हमले कर रहे थे, उन्हें ध्यान में रखें तो यह बात मुश्किल नहीं लगती कि कल को आंदोलनकारियों के बीच जाकर ये सरकारी गुंडे पुलिस पर हमले करें और फिर आंदोलन को हिंसक बताया जाने लगे।
लोकतंत्र का मुखौटा
एक बार ऐसा हो जाए तो सरकार यह कह सकती है कि हमें तो पहले से मालूम था विदेशी तत्वों के इशारे पर देश में अराजकता फैलाने के लिए यह आंदोलन चलाया जा रहा है। फिर विदेशी ताकतों की साजिश के नाम पर सरकार लोकतंत्र के उस मुखौटे को भी आसानी से उतार सकती है जिसे उसने अब तक धारण कर रखा है। लेकिन क्या भारत जैसे देश में कोई भी सरकार देशवासियों के साथ इस तरह का कपटी खेल खेलते हुए लंबे समय तक सत्ता में बनी रह सकती है?
दीर्घकालिक हित
सोचना नरेंद्र मोदी और अमित शाह को नहीं बीजेपी, संघ और एनडीए को है। यह कि मौजूदा नेतृत्व को बचाने के लिए वे अपने दीर्घकालिक हितों की बलि कब तक चढ़ाएंगे?
