-ई दोस्ती बा कि चुनावी धोबीपछाड़?
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति में दोस्ती का नया शब्दकोश छप गया है! अब गठबंधन के दो साथी एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारें, प्रचार करें, चुनावी पटखनी देने की तैयारी करें, तब भी उसे झगड़ा नहीं कहेंगे! उसे कहेंगे; मैत्रीपूर्ण मुकाबला! रविवार को नागपुर में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने साफ किया कि पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में दोस्ताना मुकाबला है और महायुति में कोई मतभेद नहीं है।
अरे भाऊ, गजबे हो गइल!
पुणे में भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार कौस्तुभ गावडे हैं। दूसरी तरफ उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने निर्दलीय सचिन सानप को अपनी शिवसेना का समर्थन देने की घोषणा की है। अब बताइए भइया, भाजपा अपने उम्मीदवार को जिताने निकलेगी, शिंदे की टुकड़ी दूसरे उम्मीदवार को जिताने निकलेगी, मगर गठबंधन में मतभेद नहीं है! मतलब चुनावी मैदान में आमने-सामने, मंत्रालय में कंधे से कंधा मिलाकर! कमाल तो आगे है। फडणवीस ने छत्रपति संभाजीनगर में शिंदे गुट के कुछ नेताओं की अलग भूमिका पर भी टिप्पणी की। कहा कि वह पार्टी की आधिकारिक भूमिका नहीं है और शिंदे को इसका संज्ञान लेना चाहिए। वाह भाऊ! इधर गठबंधन में मतभेद नहीं, उधर सहयोगी दल के नेताओं की शिकायत भी!
अब जनता किसे सही माने?
भइया, गठबंधन में दोस्ताना मुकाबले कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन दोस्ताना मुकाबला आखिर होता वैâसा है? दोनों उम्मीदवार एक-दूसरे की जीत के लिए प्रार्थना करते हैं या अपनी जीत के लिए प्रचार? अगर भाजपा जीती तो महायुति की जीत! निर्दलीय सानप जीते तो शिंदे समर्थित उम्मीदवार की जीत! और अगर चुनावी खींचतान बढ़ी तो कह दीजिएगा; लोकतंत्र में मतभिन्नता स्वाभाविक है! मगर सवाल यह है कि गठबंधन का साझा उम्मीदवार कौन है और मतदाता को किस राजनीतिक समझौते के आधार पर समर्थन मांगा जा रहा है?
