जुल्मी शासकों के खिलाफ कोई भी आंदोलन या विद्रोह सत्ता परिवर्तन के लिए ही होता है। भारतीय जनता पार्टी ने भी देश में इसी तरह एक-दो बार सत्ता परिवर्तन कराया, पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस को यह कौन बताएगा? इन सबको लगता है कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि भारत के चक्रवर्ती राजा हैं। वे अमर हैं। हमेशा वही सत्ता में रहेंगे। उन्हें कौन हटाएगा? यह सोच भारतीय संविधान के खिलाफ है। ‘‘हां, हमें ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन चाहिए,’’ ऐसा बयान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दिया तो भाजपा के मटर गर्म तवे पर तड़ातड़ उछलने लगे। ‘‘विपक्ष को कुछ समझ है या नहीं? देखा, आखिर उनके पेट की बात जुबान पर आ ही गई। आंदोलन की आड़ में उन्हें देश में सत्ता पलटनी है।’’ श्री. फडणवीस का यह गैर-जिम्मेदाराना बयान दर्शाता है कि उनका दिमाग तनाव में है। सत्ता परिवर्तन चाहिए, ऐसा कहना और उसके लिए संघर्ष करना लोकतंत्र के जिंदा होने की निशानी है। राज्य या देश की सत्ता हम लेंगे ही, ऐसा कई नेता गरजते हैं, पर भाजपा को यह मंजूर नहीं। चुनाव आयुक्त भाजपा के नौकर हैं और भाजपा जीते, सत्ता में आए, इसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने संविधान विरोधी काम किए हैं। जनता इस आदमी के खिलाफ आंदोलन कर रही है।
गैर-कानूनी तरीके से सत्ता में आई हुई
सरकार बदलनी चाहिए, ऐसा अगर अब विपक्ष कह रहा है तो इसमें क्या गलत है? लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना मोदी-फडणवीस जैसे लोगों को अराजकता लग रहा है, पर भाजपा ने अब तक जितने आंदोलन किए, वे इसी तरह के थे। आपातकाल में उनका जनसंघ जनता पार्टी में विलीन हुआ था तो ‘रेजीम चेंज’ के लिए ही। वी. पी. सिंह ने राजीव गांधी के खिलाफ बगावत कर जनता दल बनाया था और उस काम में भाजपा वाले वी. पी. सिंह को हवा दे रहे थे। उसके पीछे मकसद ‘रेजीम चेंज’ करना ही था। डॉ. मनमोहन सिंह जैसे सभ्य प्रधानमंत्री के खिलाफ भाजपा ने जो मुहिम छेड़ी थी, वह भी ‘रेजीम चेंज’ के लिए ही थी। विपक्ष का सत्ताधारियों के खिलाफ आंदोलन ‘रेजीम चेंज’ के लिए ही होता है और इस मुद्दे पर वैश्विक युद्ध हुए हैं। ईरान में ‘रेजीम चेंज’ करना प्रे. ट्रंप का मकसद था और इसके लिए अमेरिका ने ईरान पर सैकड़ों बम गिराए। ‘‘हमें ईरान में ‘रेजीम चेंज’ करना है,’’ ऐसा राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार बोलते रहे, पर ईरान में प्रे. ट्रंप ‘रेजीम चेंज’ नहीं कर पाए। फिलहाल भारत में भी लोकतंत्र बचाने के लिए जबरदस्त संघर्ष चल रहा है। उस पर मुख्यमंत्री फडणवीस कहते हैं, ‘‘यह खेल सत्ता की कुर्सी पाने के लिए है।’’ फडणवीस ने इसे खेल कहा। वैसा ही
खेल करके
और चुनाव आयोग को गुलाम बनाकर फडणवीस वगैरह लोग सत्ता में आए हैं, वह किसी ‘धर्मार्थ’ काम के लिए नहीं। सत्ता में आकर उन्होंने बिल्डरों का राज खड़ा किया। लोकतंत्र के मालिक बनने की कोशिश की। अडानी, कंबोज जैसे लोगों की तरफ राज्य के लूट का पैसा मोड़ा और इस लूट के खिलाफ जब जनता सड़कों पर उतरी तो उन्हें वह अराजकता लगने लगी। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जो संविधान बनाया, उसके मुताबिक देश चलना चाहिए, इसका एहसास मोदी-फडणवीस को अब हुआ है। यानी पिछवाड़े में आग लगी तो उन्हें संविधान याद आया। सत्ता परिवर्तन यानी ‘रेजीम चेंज’ संविधान की एक अटल क्रिया है। वह होगा ही। यह ‘रेजीम चेंज’ २०२४ के लोकसभा चुनाव में ही हो गया था, पर ज्ञानेश कुमार जैसे ‘माफिया’ चुनाव आयुक्त को साथ लेकर मोदी वगैरह लोग सत्ता से चिपके रहे। उनके पाप का घड़ा भर गया है। इसलिए ‘तिरंगा’ आंदोलन का विरोध करने की दुर्बुद्धि उन्हें सूझी। इस हरकत से ‘रेजीम चेंज’ को गति मिली। भारत में तिरंगा फहराने का जो विरोध करते हैं, ऐसे लोगों की सत्ता को उखाड़कर ‘रेजीम चेंज’ करना पड़ेगा और यह ‘रेजीम चेंज’ अटल है। लोगों ने वैसा तय कर लिया है। इसलिए मोदी-शाह की जुल्मी ‘रेजीम’ हिल गई है। संविधान के नाम पर झूठी कसमें खाने से अब फायदा नहीं होगा।
