-ई राज
एक शांत कमरा। हल्की मंद रोशनी। रूबी खिड़की के पास खड़ी बाहर सैन फ्रांसिस्को की धुंधली सड़कों को देख रही है। उसके चेहरे पर दो दशक पुराना बोझ और आज का सुकून साफ झलक रहा है। वह ईजी चेयर पर बैठ जाती है और पेन निकाल कर लिखने लगती है…
‘सत्ता की इस बड़ी सी दुनिया में… ताकतवर लोग अपनी चमक बचाने के लिए इतिहास तक बदल देते हैं। वे भूल जाते हैं कि उस चमक के पीछे, किसी और की जिंदगी राख हो चुकी है। साल २००५… सैन फ्रांसिस्को का वह दौर, जहां सियासत की चकाचौंध में मैंने खुद को खो दिया था…’
‘साल २००५। सैन फ्रांसिस्को की चमकती हुई सियासत और गैविन न्यूसम का करिश्माई व्यक्तित्व, उस दौर में हर कोई इस ग्लैमर के नशे में था। मैं, रूबी रिप्पी, मेयर के दफ्तर में अपॉइंटमेंट सेक्रेटरी के तौर पर काम कर रही थी। मेरे पति एलेक्स टार्क, गैविन के सबसे करीबी दोस्त और उनके कैंपेन के मास्टरमाइंड थे..’
‘जिंदगी बाहर से परफेक्ट लग रही थी, लेकिन भीतर से मैं शराब की लत और गहरे खालीपन के अंधेरे में डूब रही थी। उस पावर और अटेंशन के झूठे चक्रव्यूह में मैंने एक भयानक गलती कर दी, मेरा और गैविन का वह रिश्ता। वह एक ऐसा तूफान था जो कुछ पलों में सब कुछ तबाह करने वाला था।’
‘जब मैं इस दलदल से बाहर निकलने के लिए रिहैब सेंटर गई, तो वहां मुझे अपनी गलती का पूरा अहसास हुआ। मैंने बिना किसी झिझक के वहीं से एक खत लिखकर इस रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इलाज के बाद जब मैं लौटी, तो मेरा जमीर मुझे अंदर से खाए जा रहा था। मैं एलेक्स से यह झूठ नहीं छिपा सकती थी। एक खौफनाक और भारी रात में, मैंने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और खुद एलेक्स को सच बता दिया।’
वह कुछ समय तक रुकी। उसने जग से गिलास में पानी भरा और हल्के हल्के सिप लेने लगी। उसने कमरे का एक चक्कर लगाया, फिर उसे टेबल पर लिखे हुए पन्नों को देखने… ईजी चेयर पर बैठकर फिर से लिखने लगी…
‘सच सामने आते ही एलेक्स ने तुरंत इस्तीफा दे दिया और मीडिया में एक भूचाल आ गया। उस मुश्किल वक्त में कमला हैरिस ने मुझे सलाह दी थी,‘रूबी, अभी खामोश रहो, वक्त सब शांत कर देगा।’ मैंने उनकी बात मानी और दो दशकों तक चुपचाप अपना दर्द सहती रही।’
‘लेकिन खामोशी तब टूट गई जब गैविन ने अपनी बायोग्राफी में दावा किया कि वह सच उन्होंने खुद एलेक्स को बताया था। अपनी गंदी छवि और राजनीतिक करियर को बचाने के लिए एक ताकतवर नेता ने एक बार फिर सच को अपनी सुविधा के मुताबिक गढ़ लिया।
करीब २० साल बाद, आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे अपनी गलती का पछतावा है। पर उससे भी बड़ा सच यह है कि राजनीति और सत्ता के इस गंदे खेल में बड़े लोग हमेशा साफ बच निकलते हैं और आम इंसान… सिर्फ एक मोहरा बनकर पिस जाता है।’
