मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : वोटर जिंदा, लोकतंत्र में नाम गायब!

दिल्ली लाइव : वोटर जिंदा, लोकतंत्र में नाम गायब!

-अरुण कुमार गुप्ता

लोकतंत्र में वोट सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक की राजनीतिक पहचान है। लेकिन जब कोई जीवित व्यक्ति सरकारी मतदाता रिकॉर्ड में मृत दर्ज हो जाए, वर्षों से एक ही पते पर रहने वाले मतदाता का नाम सूची से गायब मिले और फॉर्म जमा करने के बावजूद उसका रिकॉर्ड दुरुस्त न हो, तो सवाल सिर्फ तकनीकी गलती का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि मतदाता सूची तैयार करने वाली व्यवस्था में ऐसी चूकें कैसे हो रही हैं और इसकी जवाबदेही किसकी है? दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सामने आई शिकायतों ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, जामिया नगर में आयोजित जनसुनवाई के दौरान कई लोगों ने मसौदा मतदाता सूची में अपने नाम और रिकॉर्ड को लेकर गंभीर विसंगतियों की शिकायत की। कुछ मतदाताओं ने बताया कि उनके नाम के सामने ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ दर्ज था, जबकि वे उसी इलाके में रह रहे थे। एक महिला ने शिकायत की कि उनके जीवित पति को रिकॉर्ड में मृत दिखाया गया। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि जरूरी फॉर्म जमा करने के बावजूद उनके नाम सूची में नहीं मिले। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के मुताबिक, एसआईआर की मसौदा मतदाता सूची से ४७,५६,७२२ नाम बाहर हुए। यह संख्या पुनरीक्षण शुरू होने के समय दर्ज लगभग १.४५ करोड़ मतदाताओं के मुकाबले करीब एक-तिहाई बैठती है। जनसुनवाई में सामने आए कुछ मामलों में मतदाताओं ने दावा किया कि उन्होंने निर्धारित फॉर्म जमा किए थे, फिर भी उनके नाम मसौदा सूची में नहीं दिखे। कुछ लोगों ने बताया कि उन्हें बूथ लेवल अधिकारी से संपर्क करने में भी कठिनाई हुई। आम नागरिक के लिए सवाल यह है कि यदि वह पहले से मतदाता था, उसने पहले चुनावों में मतदान किया और उसका पता भी नहीं बदला, तो रिकॉर्ड में हुई संभावित गलती को ठीक कराने के लिए उसे दोबारा आवेदन और दस्तावेजों की प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़े?
प्रदर्शन की जगह बदली, सवाल नहीं!
जिस राजधानी से पूरे देश की सत्ता चलती है, उसी राजधानी में अपनी बात कहने के लिए नागरिकों को अब अपने ही लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जगह तलाशनी पड़ रही है! जंतर-मंतर, जहां वर्षों से किसान, मजदूर, छात्र और राजनीतिक संगठन सत्ता के सामने अपनी मांगें रखते आए हैं, उसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर करने के फैसले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का तर्क दे सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या व्यवस्था बनाए रखने का रास्ता विरोध की आवाज को उसके पारंपरिक मंच से हटाकर ही निकलेगा? मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है और अदालत ने केंद्र तथा दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। अब निगाहें इस पर हैं कि प्रशासन अपने फैसले के पीछे कौन-से ठोस आधार पेश करता है और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को व्यावहारिक रूप से सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाता है। इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जंतर-मंतर को हटाने के फैसले का बचाव करते हुए दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया था। इस घटनाक्रम ने निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल पैदा किए हैं। आखिर जंतर-मंतर को सूची से हटाने का वास्तविक प्रशासनिक आधार क्या था? वैकल्पिक स्थलों का चयन किन मानदंडों पर हुआ? क्या वहां की क्षमता, परिवहन सुविधा और प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा का आकलन किया गया? और क्या प्रभावित संगठनों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला? लोकतंत्र की मजबूती का आकलन केवल इस बात से नहीं होता कि सरकार कितनी तेजी से फैसले लागू करती है। यह भी देखा जाता है कि असहमति जताने वाले नागरिकों के लिए व्यवस्था कितनी निष्पक्ष और सुलभ है।

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