-के.पी. मलिक
लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, मंत्री हटते हैं, अधिकारी आते-जाते हैं, लेकिन चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें तो मामला किसी एक पदाधिकारी तक सीमित नहीं रहता। वह सीधे जनता के उस भरोसे से जुड़ जाता है, जिसके आधार पर सत्ता को वैधता मिलती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बढ़ते विरोध और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठे विवाद ने आज यही सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है कि सरकार एक संवैधानिक पदाधिकारी के बचाव में इतनी राजनीतिक पूंजी क्यों लगा रही है? १० अक्टूबर को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की गई। जंतर-मंतर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। १७ अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में हुए प्रदर्शन के बाद भी पुलिस ने कई प्राथमिकी दर्ज कीं और सौ से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। इसके बावजूद विरोध की आवाज थमी नहीं। यह केवल पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव नहीं है। यह उस असंतोष का संकेत है, जिसे केवल प्रतिबंधों और गिरफ्तारियों से समाप्त नहीं किया जा सकता।
क्या एक अधिकारी सरकार से बड़ा हो गया है?
पहला सवाल यही है कि यदि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठ रहे सवाल निराधार हैं तो सरकार और चुनाव आयोग तथ्यों के साथ उनका जवाब क्यों नहीं देते? और यदि गंभीर प्रक्रियागत आपत्तियां हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच कराने में हिचक वैâसी? लेकिन यहां एक संवैधानिक तथ्य समझना जरूरी है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना किसी मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाने जैसा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद ३२४(५) के तहत उन्हें हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी है। इसलिए धर्मेंद्र प्रधान या किसी अन्य मंत्री से तुलना राजनीतिक रूपक हो सकती है, संवैधानिक समानता नहीं। फिर भी सवाल अपनी जगह है कि क्या सरकार किसी व्यक्ति का बचाव कर रही है या उस पूरी चुनावी प्रक्रिया का, जिस पर उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता निर्भर करती है? यह कहना कि ज्ञानेश कुमार के पास ऐसे गुप्त राज हैं, जिनसे कई सरकारें गिर सकती हैं। फिलहाल, अटकल होगी। ऐसा कोई प्रमाण सामने आए बिना इसे तथ्य नहीं माना जा सकता। मगर चुनाव आयोग के कामकाज, निर्णयों और आंतरिक असहमतियों पर पारदर्शिता की मांग बिल्कुल जायज है।
एसआईआर पर सवाल, केवल विपक्ष की राजनीति नहीं
मतदाता सूची का शुद्धीकरण चुनाव आयोग का वैध दायित्व है। फर्जी और मृत मतदाताओं के नाम हटाना जरूरी है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाए तो उसका मताधिकार प्रभावित होता है। इसलिए असली कसौटी यह है कि नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, आपत्तियों का निपटारा कितना निष्पक्ष है और प्रभावित नागरिक को अपना नाम वापस जुड़वाने का कितना व्यावहारिक अवसर मिलता है। चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि गलत तरीके से हटाए गए मतदाता दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर आशंकाएं जताई हैं। इस विवाद का समाधान न तो आरोपों को स्वत: सच मान लेने में है, न उन्हें राजनीतिक साजिश कहकर खारिज करने में। समाधान है आंकड़ों का स्वतंत्र परीक्षण, हटाए गए नामों का सत्यापन और प्रभावित मतदाताओं की प्रभावी सुनवाई।
भाजपा-संघ की सड़कें खाली क्यों हैं?
तीसरा सवाल सत्ता पक्ष के राजनीतिक संगठनात्मक तंत्र से जुड़ा है। भाजपा और आरएसएस के करोड़ों कार्यकर्ताओं का दावा करनेवाले संगठनों की ओर से इस विवाद के समर्थन में वैसा जनप्रदर्शन क्यों नहीं दिख रहा, जैसा दूसरे राजनीतिक अभियानों में दिखाई देता है? जिन चर्चित चेहरों और सेलिब्रिटी ने पहले सरकारी अभियानों को सार्वजनिक समर्थन दिया, उनमें से कितने इस विवाद पर खुलकर बोल रहे हैं? हालांकि, किसी सेलिब्रिटी की चुप्पी या किसी संगठन की सड़क पर अनुपस्थिति को सरकार के खिलाफ बगावत का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तब सत्तारूढ़ दल जनता के सामने अपने तर्कों को लेकर व्यापक सार्वजनिक संवाद क्यों नहीं कर रहा?
एनडीए के सहयोगी दूरी क्यों बनाए हुए हैं?
टीडीपी, जेडीयू और एकनाथ शिंदे गुट जैसे सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। क्या वे चुनाव आयोग के बचाव में उतरने से इसलिए बच रहे हैं कि यह विवाद राजनीतिक रूप से संवेदनशील है? या वे इसे भाजपा और विपक्ष के बीच का टकराव मानकर दूरी बनाए हुए हैं? इन दलों की चुप्पी को गठबंधन टूटने का संकेत कहना जल्दबाजी होगी। एनडीए की किसी बैठक का न होना भी अपने आप में बिखराव का प्रमाण नहीं है। लेकिन सहयोगी दलों के लिए चुनावी निष्पक्षता का सवाल केवल भाजपा का मामला नहीं है। वे भी उसी चुनावी व्यवस्था के सहारे सत्ता में आते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत नवीन पटनायक की ओर से आया। बीजू जनता दल के अध्यक्ष ने २५ सितंबर को ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा की मांग की थी। उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और आंकड़ों के प्रबंधन को लेकर मतभेदों की खबरों का भी उल्लेख किया। यह रुख बताता है कि चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं है। लेकिन नवीन पटनायक की मांग को किसी व्यापक गठबंधन-विरोधी मोर्चे का प्रमाण मानने के लिए अभी और राजनीतिक घटनाक्रम देखना होगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
