-हनीफ जवेरी
किसी भी अभिनेता की सबसे बड़ी ताकत उसकी पहचान होती है, लेकिन कभी-कभी यही पहचान उसके करियर की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है। दर्शक जब किसी कलाकार को एक खास अंदाज, किरदार या छवि में पसंद करने लगते हैं, तो उससे बाहर निकलना उस कलाकार के लिए आसान नहीं होता।
अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अरुण ने अपनी भाभी तबस्सुम की सिफारिश पर हिंदी फिल्म पहेली से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की, वहीं दीपिका ने फिल्मी सुन मेरी लैला से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। लेकिन टेलीविजन धारावाहिक रामायण में राम और सीता की भूमिकाएं निभाने के बाद दोनों की छवि ऐसी बन गई कि दर्शक उन्हें किसी दूसरे किरदार में स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि दोनों का अभिनय करियर राम और सीता की छवि से आगे नहीं बढ़ सका। उन्हें फिल्में भी मिलने लगीं, तो ज्यादातर धार्मिक और पौराणिक विषयों पर आधारित थीं।
राम की छवि में अरुण गोविल इस हद तक कैद हो गए थे कि एक बार तमिल फिल्म की शूटिंग के दौरान भी उन्हें अपनी इस छवि का खयाल रखना पड़ा। उन दिनों उन्हें सिगरेट पीने का बहुत शौक था। लिहाज़ा, शूटिंग के दौरान वे अपनी राम वाली छवि को ध्यान में रखते हुए सेट के पीछे जाकर सिगरेट के कश लगाया करते थे। एक दिन उनका एक प्रशंसक उनसे ऑटोग्राफ लेने के लिए वहां पहुंच गया। लेकिन सिगरेट पीते हुए अपने आराध्य राम को देखकर वह आगबबूला हो गया। ऑटोग्राफ लेना तो दूर, वह दक्षिण भारतीय भाषा में अरुण गोविल को गालियां देने लगा। अरुण समझ गए थे कि वह आदमी उन्हें गालियां दे रहा है, लेकिन उस समय चुप रहने के अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। दरअसल, लोगों ने उन्हें भगवान राम के रूप में इतना अपना लिया था कि वे उन्हें एक आम इंसान की तरह सिगरेट पीते हुए भी नहीं देख सकते थे।
जब टीवी धारावाहिक रामायण अपने चरम पर था और उसके प्रसारण के दौरान देश की सड़कें तक सुनसान हो जाया करती थीं, तब एक मैगजीन ने अपने कवर पर अरुण गोविल को एक नए अवतार में पेश करने का इरादा किया। मैगज़ीन वाले अरुण को सूट-बूट और टाई में, हाथ में वाइन का गिलास थमाकर उनकी कवर स्टोरी करना चाहते थे। लेकिन अरुण इसके लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने से भगवान राम के रूप में बनी उनकी छवि खराब हो सकती है।
सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया भी अपनी छवि को लेकर इतनी सतर्क थीं कि आम लोगों के बीच पश्चिमी कपड़े पहनकर जाने से हिचकिचाती थीं। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे जहां भी जातीं, लोग उनके पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेने लगते थे। गुजरात के बड़ौदा और अहमदाबाद के उनके दौरे सीता के रूप में बनी उनकी छवि के कारण बेहद दिलचस्प रहे। इन शहरों में कदम रखते ही स्कूलों के अधिकारी उनसे संपर्क करते और अपने स्कूल के बच्चों को कतार में खड़ा करके उनके पास लाते। मासूम बच्चे उनके पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते थे। यह नजारा मैंने खुद गुजरात के हालोल स्थित लकी स्टूडियो में अपनी आंखों से देखा है।
भगवान राम और सीता के रूप में अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया की बनी छवि का उनके करियर पर असर तो पड़ा, लेकिन इसका उन्हें एक बड़ा फायदा भी हुआ। इसी छवि के कारण दोनों को जनता के खूब वोट मिले और वे आसानी से लोकसभा पहुंच गए, जबकि उन्होंने कभी नेता बनने के बारे में सोचा भी नहीं था। अरुण और दीपिका की तरह अभिनेता सुधीर दलवी का करियर भी सार्इं बाबा की भूमिका निभाने के बाद ठहर गया। इस भूमिका के अलावा उन्हें आगे किसी दूसरी तरह के किरदार निभाने के मौके नहीं मिले।
