-उमा सिंह
गजबे है भैया, सरकार गरीब को सुरक्षा देने के लिए योजना बनाती है, मगर कुछ शातिरों ने इसे ही कमाई का कब्रिस्तान बनाने की कथित कोशिश कर डाली है। मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के तहत फर्जी मृत्यु दावों का मामला सामने आया है। आरोप है कि जिंदा लोगों को कागजों पर मुर्दा बताकर बीमा की रकम हड़पने का खेल रचा गया।
योजना का मकसद गरीब परिवारों को संकट में सहारा देना है। सालाना महज ४३६ रुपए के प्रीमियम पर पात्र खाताधारक को दो लाख रुपए का जीवन बीमा कवर मिलता है। यानी घर के कमाऊ सदस्य की मौत पर परिवार को आर्थिक मदद मिले। मगर यहां तो ठगों ने मौत को ही कमाई का धंधा बनाने की जुगत भिड़ा दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मृत्यु प्रमाणपत्र बना कैसे? दावे की जांच करने वालों ने आंखें मूंद रखी थीं क्या? बैंक से लेकर बीमा व्यवस्था तक आखिर किसकी चौकीदारी सो रही थी? गरीब की जेब से प्रीमियम काटते समय सिस्टम चुस्त और जिंदा आदमी को मुर्दा बनाते समय दुरुस्त जांच नदारद?
गजबे है, गरीब सुरक्षा के लिए पैसा भरे और ठग कागजों में उसकी तेरहवीं कराकर रकम पर नजर गड़ाएं। अगर आरोप सही निकले, तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि फर्जीवाड़े की दुकान बंद हो जाए। वरना कल कोई कहेगा, आदमी जिंदा है, मगर सिस्टम के लिए मर चुका है। वाह रे व्यवस्था, यहां सांसों से ज्यादा कागजों की कीमत है, सब गजबे है भिया..!
वाह रे कागजी दुनिया! आदमी घर में चाय पी रओ, सांस ले रओ, बाजार घूम रओ, लेकिन सरकारी कागजों में उसका राम नाम सत्य हो गओ! अब बेचारा खुद अपनी जिंदा होने की गवाही दे या पहले अपनी मौत का मातम मनाए?
