-अरुण कुमार गुप्ता
बिहार की राजनीति में मोकामा के विधायक अनंत सिंह की ललकार आखिरकार उन पर ही भारी पड़ गई। विधान परिषद चुनाव में जेडीयू के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलना और जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में उतरना पार्टी को इतना नागवार गुजरा कि उसने अनंत सिंह को छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनकी पत्नी और पूर्व विधायक नीलम देवी पर भी पार्टी ने यही कार्रवाई की है। इतना ही नहीं, जेडीयू ने अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की कार्यवाही शुरू करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिखा है। यानी पार्टी से बेदखली के बाद अब उनकी विधायकी पर भी संकट मंडराने लगा है। हालांकि, सदस्यता समाप्त होने का फैसला अभी नहीं हुआ है। जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा की ओर से जारी कार्रवाई में पार्टी के निर्देशों की कथित अवहेलना, शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल और विधान परिषद चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के विरोध में प्रचार करने को आधार बनाया गया है। पार्टी का संदेश साफ है, संगठन के भीतर रहकर नेतृत्व को चुनौती देने और उसके उम्मीदवार के खिलाफ खुलकर उतरने की कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन इस कार्रवाई के पीछे की सियासी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। अनंत सिंह का तर्क रहा है कि विधानसभा चुनाव के दौरान नीरज कुमार ने भी उनका विरोध किया था, तब पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की। उनका यह भी कहना रहा कि विधान परिषद का चुनाव सरकार बनाने या गिराने वाला चुनाव नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह केवल पार्टी अनुशासन का मामला है या पुराने राजनीतिक हिसाब-किताब का टकराव भी इसमें शामिल है?
चुनाव खत्म,
सवाल बाकी!
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए २३ अक्टूबर को मतदान संपन्न हो गया। लेकिन पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठा विवाद चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है। राजद उम्मीदवार संजीव कुमार सिंह ने चुनाव से पहले आरोप लगाया था कि सूची में बड़ी संख्या में ऐसे नाम दर्ज हैं, जिनकी संबंधित शिक्षण संस्थानों के सेवा रिकॉर्ड से पुष्टि नहीं हो रही है। उन्होंने चुनाव रद्द कर जांच कराने की मांग भी की थी। संजीव कुमार सिंह के मुताबिक, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित तौर पर ६,५०० संदिग्ध नाम सामने आए थे। उनका दावा था कि शिकायतों के बाद ५,२०० नाम हटाए गए, जबकि लगभग १,२०० नामों पर अब भी सवाल थे। ये आंकड़े उम्मीदवार के दावे हैं; इन्हें फर्जी मतदाताओं की स्वतंत्र रूप से प्रमाणित संख्या नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट के अनुसार, पटना साइंस कॉलेज ने भी अपनी सूची के मिलान में पांच कथित संदिग्ध नाम मिलने और तीन वास्तविक शिक्षकों के नाम सूची में नहीं होने की शिकायत निर्वाचन अधिकारियों से की थी। ऐसे मामलों में सवाल केवल नामों की संख्या का नहीं, बल्कि सत्यापन की प्रक्रिया और शिकायतों पर हुई कार्रवाई का भी है। तेजस्वी यादव ने कथित फ़र्जी मतदाताओं को लेकर चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, जेडीयू उम्मीदवार नवल किशोर यादव ने इन आरोपों को ख़ारिज किया। मतदान के दौरान मोकामा में प्रतिद्वंद्वी नेताओं के समर्थकों के बीच झड़प की भी खबर आई। इन घटनाओं के बीच जरूरी है कि राजनीतिक आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।
‘मतपेटियां खुलीं भी नहीं, जीत का बिगुल बजा दिया!’
बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट पर २३ अक्टूबर को मतदान के दौरान मुकाबला सिर्फ़ दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो नेताओं के दावों और प्रतिष्ठा के बीच भी दिखाई दिया। जेडीयू के मोकामा विधायक अनंत सिंह अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जन सुराज के प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं। मतदान के दिन उन्होंने अपने समर्थित उम्मीदवार की जीत का भरोसा जताया और नीरज कुमार की राजनीतिक ताकत पर सवाल उठाए। मोकामा में समर्थकों के बीच हुई झड़प और पुलिस की कार्रवाई के बाद अनंत सिंह ने दावा किया कि उनके समर्थकों को हिरासत में लेने से चुनावी नतीजों पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा। उनका कहना था कि अंतिम फैसला जनता करेगी और वोट खरीदे नहीं जा सकते। उन्होंने समर्थकों के उत्साह और जीत के जश्न का भी जिक्र किया। अनंत सिंह के इस बयान में उनके आत्मविश्वास की वजह का एक संकेत जरूर मिलता है उन्हें अपने समर्थकों और मतदाताओं पर भरोसा है। लेकिन समर्थकों का उत्साह और वास्तविक मतदान अलग-अलग बातें हैं। यह जानने के लिए कि उनका प्रभाव मतपेटियों तक कितना पहुंचा, मतगणना के आंकड़ों का इंतजार करना होगा।
