मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है : लोकतंत्र में सवाल पूछना भी अब बीमारी हो गई!

गजबे है : लोकतंत्र में सवाल पूछना भी अब बीमारी हो गई!

-उमा सिंह

वाह रे राजनीति, तुम भी बड़ी अजीब हो.., यहां आए दिन मुद्दों की ऐसी धुलाई हो रही है कि साबुन बेचने वालों को भी शर्म आ जाए। बीते कुछ दिनों की घटनाओं को देखते हुए तो यही लग रहा है कि सरकार से सवाल पूछने का जमाना गया, अब सवाल पूछने वाले का चरित्र प्रमाणपत्र जारी करने का जमाना आ गया है। कहानी शुरू हुई अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से। जामिया के छात्रों के समर्थन में सरकार पर सवाल उठाते हुए शाह ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कह दिया। बस, फिर क्या था, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू मैदान में उतरे और शाह को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बता दिया। रिजिजू बोले, `उन्हें शाह का असली चरित्र देर से समझ आया, मुझे लगता था कि नसीरुद्दीन शाह एक ऑर्डिनरी एक्टर हैं। मैं उनका सम्मान करता था और उन्हें पसंद भी करता था। मुझे कभी पता ही नहीं था कि उनकी सोच दिमागी नक्सली जैसी है, अरे मंत्री जी, कलाकार की फिल्में देखते-देखते उनके विचारों की पटकथा भी पढ़ लेते तो शायद इतना बड़ा खुलासा नहीं होता। लेकिन पिक्चर में ट्विस्ट अभी बाकी है मेरे दोस्त, रिजिजू के बयान पर सीपीएम नेता हन्नान मोल्लाह ने पलटवार करते हुए रिजिजू को ही ‘मेंटल क्रिमिनल’ कह दिया। अब जनता माथा पीटे कि देश में लोकतंत्र चल रहा है या नामकरण प्रतियोगिता।
इधर कोई सवाल करे तो ‘अर्बन नक्सल’, कोई विरोध करे तो ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और कोई इन तमगों पर सवाल उठाए तो उसके लिए भी नया तमगा तैयार। लगता है राजनीति के शब्दकोश में ‘असहमति’ का अर्थ ही बदल दिया गया है। वाकई गजबे है.., महंगाई पूछो तो देशविरोधी, बेरोजगारी पूछो तो दिमागी नक्सल और शिक्षा पर सवाल उठाओ तो लोकतंत्र के दुश्मन! अब तो डर है कि कल को कोई संविधान पढ़ने लगेगा तो उसे भी ‘मानसिक उपद्रवी’ न घोषित कर दिया जाए।
जनाब, लोकतंत्र कोई स्कूल की क्लास नहीं, जहां सिर्फ मॉनिटर की बात माननी पड़े। यहां सरकार से सवाल पूछना नागरिक का हक है, गुनाह नहीं।

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