मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : सैफई की सियासत बनाम मुस्लिम नेतृत्व का सवाल?

तीर-ए-तौसीफ : सैफई की सियासत बनाम मुस्लिम नेतृत्व का सवाल?

-तौसीफ कुरैशी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में २०२७ के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ एक पुराना सवाल फिर सिर उठाने लगा है कि आखिर मुस्लिम समाज को उसकी आबादी के अनुपात में राजनीतिक हिस्सेदारी क्यों नहीं मिलती? असदुद्दीन ओवैसी ने कैराना में सपा के मालिक पर हमला करते हुए कहा कि पार्टी का नाम ‘सपा’ के बजाय ‘सपा यादव परिवार’ होना चाहिए। यह बयान केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं है, बल्कि उस बेचैनी की अभिव्यक्ति भी है, जो मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के सवाल पर लंबे समय से मौजूद है। अखिलेश यादव की राजनीति के सामने ओवैसी की चुनौती कितनी बड़ी होगी, इसका फैसला तो चुनाव करेगा, लेकिन उनके सवालों को महज वोट काटने की साजिश बताकर खारिज कर देना राजनीतिक समझदारी नहीं होगी।
लोकतंत्र में सवालों का जवाब सवाल उठाने वाले की नीयत पर हमला करके नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों से दिया जाता है। सपा खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति का झंडाबरदार बताती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सामाजिक न्याय का अर्थ केवल सत्ता में किसी एक परिवार की हिस्सेदारी है? क्या पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी केवल चुनाव के समय याद आनेवाला नारा है? मुस्लिम समाज को वोटबैंक मानकर उससे समर्थन मांगना और उसके भीतर स्वतंत्र, शिक्षित तथा मुखर नेतृत्व विकसित होने देना ये दो अलग-अलग बातें हैं। सपा की राजनीति पर यह आरोप लंबे समय से लगता रहा है कि उसने मुस्लिम समाज के स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व को पर्याप्त जगह नहीं दी। इस आरोप की जांच प्रतिनिधित्व, टिकट वितरण और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका के आधार पर होनी चाहिए।
समाज को ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो केवल मालिक के फैसलों पर मुहर न लगाएं, बल्कि अपने समुदाय और क्षेत्र के सवालों पर भी बेबाकी से बोल सकें। दूसरी तरफ, ओवैसी के सामने भी अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने की चुनौती है। केवल सपा पर हमला करने से मुस्लिम समाज का भरोसा नहीं जीता जा सकता। उन्हें यह भी बताना होगा कि उनकी राजनीति भाजपा को रोकने, संविधान की रक्षा करने और बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे सवालों पर क्या ठोस विकल्प देती है। लेकिन विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल अखिलेश यादव और ओवैसी में से किसी एक को चुनने का नहीं, बल्कि भाजपा को हराने के लिए व्यापक राजनीतिक समझ विकसित करने का है। यदि कांग्रेस और सपा वास्तव में भाजपा को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं, तो AIMIMको विपक्षी एकता की किसी संभावना से बाहर रखने का तर्क क्या है? क्या ओवैसी कोई राजनीतिक दल नहीं चलाते? क्या लोकतांत्रिक गठबंधन की शर्त केवल यही होगी कि हर राजनीतिक शक्ति सैफई के नेतृत्व के सामने नतमस्तक हो? सत्ता और राजनीति से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है। इसलिए सवाल अखिलेश यादव से भी पूछा जाना चाहिए और ओवैसी से भी। गठबंधन किसी की जागीर नहीं, जनता की उम्मीदों का समझौता होना चाहिए। २०२७ में भाजपा के सामने चुनौती खड़ी करनी है तो विपक्ष को अपनी महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठना होगा। मुस्लिम समाज को केवल वोट देने वाला समुदाय नहीं, बल्कि नेतृत्व करने वाला राजनीतिक साझेदार मानना होगा। वरना चुनाव से पहले एकता के नारे लगेंगे और चुनाव के बाद हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ा जाएगा। लोकतंत्र में किसी परिवार का राजनीतिक वर्चस्व स्थायी नहीं होता। स्थायी होती है जनता की हिस्सेदारी की मांग।
सत्यमेव जयते

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