सूफी खान
अमेरिका का साथ पाकर मिडिल ईस्ट में नई तबाही लाने, यानी ईरान से एक और जंग करने पर आमादा प्रधानमंत्री नेतन्याहू और उनका गठबंधन चुनावी नतीजों में सत्ता से दूर रह गया है।
मिडिल ईस्ट की सियासत को करीब से जानने वाले कहते हैं कि अगर किंगमेकर बनी अरब पार्टियों की मदद से विपक्ष के गादी आइजेनकोट गठबंधन ने सरकार बना ली, तो प्रधानमंत्री नेतन्याहू की बड़ी हार होगी। हालांकि, गादी आइजेनकोट भी एक दक्षिणपंथी नेता हैं और उनके विचार प्रधानमंत्री नेतन्याहू के विचारों से बहुत अलग नहीं हैं, लेकिन क्षेत्र के मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार प्रधानमंत्री नेतन्याहू को सत्ता में आने से रोकना है तो आइजेनकोट को मुसलमानों की अरब पार्टी से समझौता करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
इजरायल की धुर दक्षिणपंथी सियासत में हालांकि, फिलिस्तीन की आजादी और दो-राष्ट्र सिद्धांत की वकालत करने वाली अरब पार्टियों के करीब कोई भी मुख्यधारा का गठबंधन जाना नहीं चाहता है, लेकिन पहले ऐसा हो चुका है, जब मजबूरी में ही सही, यहूदी बहुमत वाली पार्टियों को अरब मुसलमानों का साथ लेना पड़ा था। जून २०२१ में मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राअम (यूनाइटेड अरब लिस्ट) इजरायल की सरकार में शामिल होने वाली पहली स्वतंत्र अरब पार्टी बनी थी। राअम ने आठ पार्टियों के गठबंधन को समर्थन दिया था। इस गठबंधन में दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी यहूदी पार्टियां शामिल थीं।
उस वक्त इस गठबंधन का मकसद प्रधानमंत्री नेतन्याहू को पद से हटाना था। इसके बाद दक्षिणपंथी नेता नफ्ताली बेनेट इजरायल के प्रधानमंत्री बने। बाद में मध्यमार्गी नेता यायर लैपिड ने यह पद संभाला। मंसूर अब्बास ने इस पैâसले का बचाव करते हुए कहा था कि अरब पार्टियों को हमेशा विपक्ष में बैठने के बजाय यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। इससे अरब समुदायों के लिए ज्यादा बजट मिल सकता है। साथ ही अपराध पर रोक लगाने और सड़कों, स्कूलों जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
उससे भी पहले साल १९९२ से १९९५ के बीच भी अरब पार्टियों ने यहूदी नेतृत्व वाली सरकार का साथ दिया था। हदाश और मदा अरब पार्टियों ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। यही वजह रही कि उस वक्त के प्रधानमंत्री रॉबिन की सरकार ने इजरायल और फिलिस्तीन के बीच ऐतिहासिक ओस्लो समझौता करवाया था। इस समझौते का मकसद फिलिस्तीन और इजरायल के दरमियान बरसों से चले आ रहे तनाव को कम करना था।
राअम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास ने इस बार भी कहा है कि उनकी पार्टी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने को तैयार है। वहीं जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबरीन ने कहा कि उनकी पार्टी बाहर से अल्पमत सरकार को समर्थन दे सकती है, लेकिन सरकार में शामिल नहीं होगी। यही वजह है कि हालात भांपकर प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने शुरू से ही माहौल बनाना शुरू कर दिया था कि कुछ भी हो जाए, उनका गठबंधन अरब दलों का समर्थन नहीं लेगा। उन्होंने विपक्षी पार्टियों पर भी पहले से निशाना साधना शुरू कर दिया है कि वे मुस्लिमों का समर्थन लेकर सरकार वैâसे बनाएंगी और इजरायल को वैâसे चलाएंगी? यह नामुमकिन है… ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन सियासत में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। यह बात इजरायल की राजनीति पर भी लागू होती है। बड़ी बात यह है कि वहां पहले भी अरब और यहूदी पार्टियां मिलकर सरकार बना चुकी हैं। क्या इस बार भी ऐसा मुमकिन होगा? यह बड़ा सवाल है।
