मुख्यपृष्ठधर्म विशेषकार्तिक में दीपदान; प्रकाश के साथ संकल्प का पर्व

कार्तिक में दीपदान; प्रकाश के साथ संकल्प का पर्व

-शीतल अवस्थी

-कार्तिक मास में दीप जलाने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अज्ञान, आलस्य और निराशा से बाहर आने का संदेश है।

कार्तिक मास को भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष माना गया है। इस महीने मंदिर, तुलसी, नदी-तट और घर के द्वार पर दीप जलाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से मन की नकारात्मकता घटती है और जीवन में शुभता का संचार होता है।
दीप की लौ पांच तत्त्वों का स्मरण कराती है। मिट्टी का पात्र पृथ्वी, तेल या घी जल, लौ अग्नि, उसके आसपास की वायु और ऊपर उठता प्रकाश आकाश का प्रतीक है। इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि मनुष्य अपने शरीर, साधन और कर्म को लोककल्याण के लिए प्रकाशित करे।
संध्या के समय पूजा-स्थान साफ करके एक दीप भगवान के सामने, एक तुलसी के निकट और एक घर के प्रवेश-द्वार पर रखा जा सकता है। तेल या घी की मात्रा सीमित रखें। दीप को स्थिर पात्र में रखें तथा पर्दे, कागज और बच्चों की पहुंच से दूर जलाएं। मंत्र के रूप में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ अथवा ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप किया जा सकता है।
दीपदान का श्रेष्ठ रूप किसी जरूरतमंद के जीवन में प्रकाश लाना है। किसी विद्यार्थी को पुस्तक देना, रोगी की सहायता करना अथवा अंधेरे सार्वजनिक स्थान पर सुरक्षित प्रकाश की व्यवस्था कराना कार्तिक साधना का व्यावहारिक विस्तार है।
धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं; स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी मामलों में विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।

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