-प्रणव प्रियदर्शी
अक्टूबर महीने की आखिरी तारीख से जो प्रक्रिया शुरू हुई, नवंबर की पहली तारीख ने उस पर मुहर लगा दी। ये २४ घंटे देश में लोकतांत्रिक संघर्षों के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं।
विशेष आयोजन
शनिवार ३१ अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर जिस विशेष आयोजन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘महाभियोग’ प्रस्ताव पारित किया गया, उसे मीडिया का एक हिस्सा ‘मॉक पार्लियामेंट’ बता रहा है, लेकिन यह शब्द इसके सही स्वरूप को नहीं दर्शाता। वास्तव में इसे ‘जन संसद’ का एक रूप कहा जाना चाहिए।
विपक्ष की अनदेखी
देश की मौजूदा संसद भी लोगों द्वारा चुनी हुई है और इस अर्थ में इसे आम जनता की ही अभिव्यक्ति माना जाएगा। लेकिन पिछले कुछ समय से इसे जिस तरह से संचालित किया जा रहा है, उस पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। विपक्ष लगातार यह शिकायत कर रहा है कि उसे संसद में अपनी बात कहने, अपने मुद्दे उठाने का मौका नहीं दिया जा रहा।
एक ही अंतर
वैसे सत्ता पक्ष इन आरोपों को गलत बताता रहा है। लेकिन संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को, उसकी शिकायतों को सत्ता पक्ष के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। विपक्ष और सत्तापक्ष में अगर कोई अंतर होता है तो यही कि सत्तापक्ष के पास सरकार का पूरा नियंत्रण होता है जिसके जरिए वह अपनी बातों, कार्यक्रमों और योजनाओं को अमल में ला सकती है। विपक्ष के पास यह सुविधा नहीं होती।
वोट की ताकत
इस एक अंतर को छोड़ दें तो संसदीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष में हैसियत का कोई अंतर नहीं होता। कारण यह है कि दोनों ही लोगों के वोट की बदौलत संसद में पहुंचे होते हैं। मगर हाल का अनुभव इस सिद्धांत से मेल खाता नहीं दिख रहा। नेता प्रतिपक्ष लगातार यह शिकायत करते हैं कि संसद में जब भी वे कुछ ऐसा कहने को होते हैं जो सत्ता पक्ष को रास नहीं आता, उनका माइक बंद हो जाता है। हालांकि, स्पीकर इस आरोप को सर्वथा गलत बताते हैं। लेकिन इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता कि आजाद भारत के इतिहास में अब तक विपक्ष ने कभी ऐसा आरोप नहीं लगाया था।
मिलीभगत का आरोप
यही बात चुनावों के संचालन पर भी लागू होती है। चुनावों में गड़बड़ियां शुरू से होती रही हैं। जहां जिन दलों का जोर होता था वहां उनके समर्थकों द्वारा बूथ लूटे जाने की शिकायतें आती थीं। चुनाव आयोग पर नाकारा-निकम्मा होने के आरोप लगाए जाते थे। लेकिन कभी यह नहीं हुआ कि चुनाव आयोग पर सत्ता पक्ष के साथ सांठ-गांठ रखने या एक पार्टी बन जाने का आरोप लगा हो। कभी ऐसा भी नहीं हुआ कि चुनाव आयोग ने विपक्ष के आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया हो या विपक्ष की शिकायतों के जवाब में उस पर आरोप लगाने लगा हो।
संप्रभुता पर सवाल
यह सब पहली बार होता दिख रहा है, वह भी तब जब चुनाव आयोग पर आरोप सिर्फ चुनाव प्रक्रिया में धांधली तक सीमित नहीं रहे। एसआईआर के जरिए उसने १३ करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से निकाल दिए हैं। जाहिर है, यह देश की वोटर बिरादरी के खिलाफ ऐसा अपराध है, जिसकी आजाद भारत में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ध्यान रहे, भारतीय संविधान के मुताबिक, संप्रभुता देश की जनता में ही निहित है। इस संप्रभुता पर किसी तरह का सवाल उठाने की हिम्मत इमर्जेंसी के दौरान भी सरकार ने नहीं की थी।
सत्ता पक्ष की उदासीनता
ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि जनता के वोटों से चुनी संसद एकमत होकर इसकी सुनवाई करते हुए दिखती। लेकिन सत्ता पक्ष इस अपराध को संज्ञान में लेने तक को तैयार नहीं है। इन विशेष परिस्थितियों में जनता की आकांक्षा को अभिव्यक्ति देने और अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए यह विशेष आयोजन किया गया। इसमें न केवल संसदीय विपक्ष बल्कि सिविल सोसाइटी का हिस्सा और छात्र आंदोलन के नेतृत्व के साथ-साथ वोटर लिस्ट से बाहर किए गए नागरिक भी शामिल हुए।
रैली की मुहर
और ‘जनसंसद’ की इस ऐतिहासिक बैठक के अगले ही दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में वह विशाल रैली हुई, जिसमें भीड़ ने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। सांकेतिक रूप से देखा जाए तो यह ‘जनसंसद’ में पारित प्रस्ताव पर जनता की मुहर थी।
छेड़खानी बर्दाश्त नहीं
भारत में बड़े से बड़ा बदलाव भी शांतिपूर्ण ढंग से लाने की परंपरा रही है। इस परंपरा के अनुरूप २० जुलाई को जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से जो प्रक्रिया शुरू हुई उसने इन दो दिनों में ऐतिहासिक स्वरूप हासिल कर लिया है। अंजाम चाहे जो भी हो, इतना तो साबित हो ही चुका है कि भारतीय समाज किसी भी सरकार की सौ गलतियां माफ कर सकता है, लेकिन लोकतंत्र के साथ छेड़खानी बर्दाश्त नहीं करता।
