मुख्यपृष्ठस्तंभपटना की पॉलिटिक्स : जदयू को हराओ, भाजपा में इनाम पाओ!

पटना की पॉलिटिक्स : जदयू को हराओ, भाजपा में इनाम पाओ!

-अरुण कुमार गुप्ता

बिहार की राजनीति में गठबंधन की दोस्ती का एक नया और दिलचस्प चेहरा सामने आया है। एमएलसी चुनाव में जदयू के उम्मीदवारों को शिकस्त देने वाले निर्दलीय नेताओं का भाजपा में शामिल होना अब एनडीए की अंदरूनी राजनीति को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। जिस चुनाव में सहयोगी दल जदयू को नुकसान पहुंचा, उसी चुनाव के विजेताओं को भाजपा ने अपने पाले में जगह दे दी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एनडीए में सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की कोई सीमा बची है। एमएलसी चुनाव के नतीजों ने पहले ही जदयू के सामने आत्ममंथन की चुनौती खड़ी कर दी थी। कई सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने स्थापित राजनीतिक दलों के समीकरण बिगाड़ दिए। लेकिन चुनाव के बाद इन विजेताओं का भाजपा के करीब आना बिहार की सियासत में नई चर्चा का विषय बन गया है। यहां सबसे बड़ा सवाल भाजपा और जदयू के रिश्तों का है। क्या चुनाव के दौरान दोनों दलों के बीच कोई साझा रणनीति थी? क्या सहयोगी उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह गई? और क्या चुनाव के बाद राजनीतिक फायदे के लिए गठबंधन के भीतर की प्रतिस्पर्धा को नजरअंदाज किया जा रहा है?
एनडीए में बड़ा भाई बनने की होड़!
बिहार में एनडीए की राजनीति अब केवल सत्ता बचाने और विपक्ष को चुनौती देने तक सीमित नहीं रह गई है। गठबंधन के भीतर ही राजनीतिक ताकत और वर्चस्व को लेकर नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। एमएलसी चुनाव के बाद भाजपा का कुनबा बढ़ाने की कोशिश और जदयू के उम्मीदवारों को चुनौती देने वाले नेताओं का भाजपा के करीब पहुंचना इस बात का संकेत है कि एनडीए में बड़े भाई की भूमिका को लेकर सियासी प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है। भाजपा के लिए नए राजनीतिक चेहरों को अपने साथ जोड़ना संगठन विस्तार की रणनीति हो सकती है। लेकिन जदयू के नजरिए से यह घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है। आखिर जिस गठबंधन में दोनों दल एक-दूसरे के सहयोगी हैं, वहां चुनाव के दौरान एक-दूसरे के राजनीतिक हितों की रक्षा कितनी प्राथमिकता में है? क्या भाजपा अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए जदयू के पारंपरिक राजनीतिक आधार में भी जगह बनाने की कोशिश कर रही है? बिहार में लंबे समय तक जदयू और भाजपा ने मिलकर सत्ता की राजनीति की है। दोनों दलों के बीच सीटों, नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर संतुलन बनाए रखना गठबंधन की मजबूरी भी रहा है, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों में भाजपा की बढ़ती महत्वाकांक्षा और जदयू की अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती के बीच टकराव की संभावनाएं नजर आने लगी हैं। एमएलसी चुनाव के नतीजों ने इस बहस को और हवा दी है। निर्दलीय उम्मीदवारों की सफलता और चुनाव के बाद उनके राजनीतिक ठिकानों में बदलाव ने सहयोगी दलों के बीच समन्वय पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर भाजपा-जदयू के टकराव का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
अभिषेक झा की हार में अपनों का चक्रव्यूह!
बिहार के एमएलसी चुनाव में अभिषेक झा की हार अब केवल एक उम्मीदवार की चुनावी पराजय नहीं रह गई है। इस नतीजे ने एनडीए के भीतर की सियासी खींचतान और सहयोगी दलों के बीच तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव में मुकाबला विपक्ष और निर्दलीय उम्मीदवारों से था, लेकिन हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या अभिषेक झा को बाहरी चुनौती से ज्यादा भीतर की राजनीतिक परिस्थितियों ने नुकसान पहुंचाया? चुनावी राजनीति में उम्मीदवार की जीत केवल उसके व्यक्तिगत जनाधार पर निर्भर नहीं करती। संगठन की ताकत, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, सहयोगी दलों का समर्थन और स्थानीय नेताओं की भूमिका भी निर्णायक होती है। ऐसे में यदि गठबंधन का उम्मीदवार अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाता, तो उसके पीछे की राजनीतिक परिस्थितियों की समीक्षा जरूरी हो जाती है। इस चुनाव ने एनडीए के सामने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी कर दी है। गठबंधन में शामिल दल यदि एक-दूसरे के उम्मीदवारों को पूरी राजनीतिक ताकत नहीं देते, तो चुनावी मंच पर एकजुटता का दावा बेमानी साबित हो सकता है। चुनाव के बाद जिम्मेदारी तय करने और हार के कारणों की समीक्षा करने का दबाव भी बढ़ेगा।

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