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कोर्ट-रूम : गिरफ्तारी में बाधा, सजा की शर्त तोड़ना और अदालत में अपमान

-एड. कनई बिस्वास

भाग:८९

-धारा २६५, २६६ और २६७

कानूनी गिरफ्तारी में बाधा डालना या किसी को हिरासत से छुड़ाना, सजा में मिली छूट की शर्त तोड़ना और न्यायिक कार्यवाही के दौरान बैठे लोक सेवक का जानबूझकर अपमान या उसकी कार्यवाही में व्यवधान डालना भी अपराध है। भारतीय न्याय संहिता की धारा २६५, २६६ और २६७ इन्हीं स्थितियों से संबंधित हैं।
केस स्टडी- १: ‘गिरफ्तारी में बाधा या आरोपी को छुड़ाना’ (धारा २६५)
पुलिस एक व्यक्ति को कानूनन गिरफ्तार कर रही थी। उसके कुछ परिचितों ने पुलिस को घेर लिया, गिरफ्तारी में बाधा डाली और आरोपी को पुलिस की पकड़ से छुड़ाकर भगा दिया। मामला ऐसी स्थिति का था, जिसके लिए इस अध्याय में कोई अन्य विशिष्ट प्रावधान लागू नहीं था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या गिरफ्तारी कानूनन की जा रही थी?
क्या आरोपी ने गिरफ्तारी का विरोध या उसमें बाधा डाली अथवा हिरासत से भागने या किसी को छुड़ाने में सहायता की?
क्या मामला किसी अन्य विशिष्ट धारा में पहले से शामिल नहीं था?
फैसला- ये तत्व सिद्ध होने पर धारा २६५ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: धारा २६५ एक अवशिष्ट प्रावधान है। यह उन मामलों पर लागू होती है, जिनमें वैध गिरफ्तारी का विरोध या बाधा, हिरासत से भागना अथवा किसी को छुड़ाना शामिल हो और जिनके लिए अलग से विशिष्ट प्रावधान न हो।
केस स्टडी- २: ‘सजा में छूट की शर्त तोड़ी’ (धारा २६६)
एक दोषी व्यक्ति को उसकी सजा में कुछ शर्तों के साथ छूट दी गई। उसने उन शर्तों को स्वीकार कर लिया, लेकिन रिहाई के बाद जानबूझकर निर्धारित शर्त का उल्लंघन कर दिया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या सजा में छूट किसी शर्त के अधीन दी गई थी?
क्या दोषी ने उस शर्त को स्वीकार किया था?
क्या उसने उस शर्त का उल्लंघन किया?
फैसला- सजा में छूट की स्वीकार की गई शर्त का उल्लंघन सिद्ध होने पर धारा २६६ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: सजा में छूट बिना जिम्मेदारी की आजादी नहीं है। यदि छूट शर्तों पर दी गई है तो उनका पालन करना आवश्यक है।
केस स्टडी- ३: ‘न्यायिक कार्यवाही में जानबूझकर अपमान’ (धारा २६७)
एक न्यायिक कार्यवाही के दौरान एक व्यक्ति ने कार्यवाही संचालित कर रहे लोक सेवक का जानबूझकर अपमान किया और बार-बार ऐसा व्यवधान डाला, जिससे कार्यवाही प्रभावित हुई।
अदालत क्या देखेगी?
क्या संबंधित लोक सेवक न्यायिक कार्यवाही के किसी चरण में बैठा था?
क्या आरोपी ने जानबूझकर उसका अपमान किया या कार्यवाही में व्यवधान डाला?
क्या यह कृत्य उस लोक सेवक की उपस्थिति में किया गया?
फैसला- ये तत्व सिद्ध होने पर धारा २६७ के तहत कार्रवाई हो सकती है।
समझें: अदालत के निर्णय से असहमति या कानूनी आपत्ति करना अपने आप अपराध नहीं है। धारा २६७ का केंद्र न्यायिक कार्यवाही के दौरान बैठे लोक सेवक का जानबूझकर अपमान करना या उसकी कार्यवाही में जानबूझकर व्यवधान डालना है।
धारा २६५ से २६७ का संदेश साफ है- कानूनी गिरफ्तारी में बाधा डालकर किसी को छुड़ाना, सजा में मिली छूट की शर्त तोड़ना और न्यायिक कार्यवाही को जानबूझकर अपमान या व्यवधान से प्रभावित करना कानून की प्रक्रिया में हस्तक्षेप है और आपराधिक जिम्मेदारी पैदा कर सकता है।
(अगले अंक में: धारा २६८, २६९ और २७० – न्यायिक कार्यवाही में बैठे लोक सेवक के प्रश्न का उत्तर देने से इनकार, जमानत या बंधपत्र पर छोड़े गए व्यक्ति का अदालत में उपस्थित न होना तथा सार्वजनिक उपद्रव से जुड़े प्रावधानों को सरल उदाहरणों से समझेंगे।)

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