-शीतल अवस्थी
कार्तिक कृष्ण एकादशी का यह व्रत भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है। इसके अगले दिन गोवत्स द्वादशी के साथ दीपावली पर्व-क्रम आगे बढ़ता है।
५ नवंबर को रमा एकादशी और गोवत्स द्वादशी का संयोग है। ‘रमा’ देवी लक्ष्मी का एक नाम है। इसलिए इस एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता में इसे पापों के प्रायश्चित, आर्थिक संयम और आत्मशुद्धि का अवसर माना गया है।
व्रती दशमी से सात्त्विक भोजन ग्रहण करके एकादशी को प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसीदल, फल और दीप अर्पित करके ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप किया जा सकता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में स्थानीय पंचांग के अनुसार करना चाहिए।
उपवास का अर्थ भूखे रहकर शरीर को कष्ट देना नहीं है। मधुमेह, गर्भावस्था, वृद्धावस्था अथवा नियमित औषधि लेने की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह के अनुसार फलाहार या सामान्य सात्त्विक भोजन लिया जा सकता है। झूठ, क्रोध, अपव्यय और निंदा से बचना भी व्रत का महत्त्वपूर्ण अंग है।
रमा एकादशी का संदेश है कि लक्ष्मी का स्थायी निवास विवेकपूर्ण खर्च, ईमानदार कमाई और दानशीलता में होता है। अगले दिन गोवत्स द्वादशी पर पशुओं के प्रति करुणा का संकल्प इस साधना को सामाजिक अर्थ प्रदान करता है।
धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं; स्वास्थ्य संबंधी मामलों में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता दें।
